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सोमवार, सितंबर 14

रात ढल चुकी है

 रात ढल चुकी है 

होने को है भोर

प्रातःसमीरण में झूम रही हैं 

पारिजात की डालियाँ 

गा रहे हैं झींगुर अपना अंतिम राग

स्तब्ध खड़ा नीम का वृक्ष उनींदा है 

अभी जागेगा 

उषा की पहली किरण का स्वागत करने 

घरों की खिड़कियाँ बंद हैं 

सो रहे हैं अभी लोग 

सुबह की मीठी नींद में 

हजार मनों में चल रहे हजार स्वप्न 

पंछी लेने लगे अंगड़ाई निज नीड़ों  में 

है अब जागने की बेला   

देवता आकाश में और धरा पर प्रकृति 

तत्पर  हैं स्वागत करने एक दूसरे का 

ब्रह्म मुहूर्त के इस क्षण में 

 रात्रि प्रलय के बाद 

पुनः सृजित होगी सृष्टि

नव पुष्प खिलेंगे 

नव निर्माण होगा पाकर नई दृष्टि !


शुक्रवार, अगस्त 11

तिर जाओ पात से

तिर जाओ पात से

सुनो ! तारे गाते हैं
फूलों के झुरमुट.. प्रीत गीत गुनगुनाते हैं
पल भर को निकट जाओ वृक्षों के
कानों में कैसी, धुन भर जाते हैं !

देखो ! गगन तकता है
बदलियों का झुंड झूम-झूम कर बरसता है
ठिठको जरा सा.. बैठो, हरी घास पर
पा परस दिल.. कैसे धड़कता है !

बहो ! कलकल बहती है
नदिया की धारा नाच बात यही कहती है
पात से तिर जाओ नीर संग
हृदय की तृषा मिटे, छांव वह मिलती है !

जगो !  उषा जगाती है
हर भोर उसी का संदेश लेकर आती है
आतुर है प्रकृति लुटाने को
ज्योति भरे नित नवीन, अंकुर उगाती है !







गुरुवार, जून 18

वही एक है

वही एक है



एक मधुर धुन वंशी की ज्यों
एक लहर अठखेली करती,
एक पवन वासन्ती बहकी
एक किरण कलियों संग हँसती !

एक अश्रु चरणों पर पावन
एक दृष्टि हर ले जो पीड़ा,
 एक परस पारस का जैसे
एक शिशु करता हो क्रीड़ा !

एक परम विश्राम अनूठा
एक दृश्य अभिराम सजा हो,
एक स्वप्न युगों तक चलता  
एक महावर लाल रचा हो !

एक मन्त्र गूँजे अविराम
एक गीत लहरों ने गाया,
एक निशा सोयी सागर पर
एक उषा की स्वर्णिम काया !

बुधवार, अगस्त 6

वह

वह


चहका कूक बनकर
महका फूल बनकर,
उमगा दूब सा वह
विहंसा धूप सा वह !

खिलता हर कली में
फिरता हर गली में,
रचता नीड़ सुंदर
बहता नीर बनकर !

जलता तारिका बन
उड़ता सारिका बन
गिरता निर्झरों सा
पलता नव शिशु सा !

भजता भक्त बनकर
रचता कवि बनकर
गढ़ता बुत नये नित
बढ़ता उषा संग नित !



बुधवार, अप्रैल 9

मिला वही उजियारा बनकर

मिला वही उजियारा बनकर


अँधियारा छंट गया उसी पल
बन याद इक बसी हृदय में
 एक गीत की कड़ी सुमधुर !

नयन भिगोये कसक घनी थी
राह नजर नहीं आती थी
 मिला वही उजियारा बनकर !

हारा तम हुई विजय उषा की
 टूटे बंधन मुक्त हुआ मन
स्वप्नों को भी लगे नये पर !