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सोमवार, दिसंबर 18

इक लहर उठी श्वासों की



 इक लहर उठी श्वासों की

ओउम् की पुकार उठी 
हुई जागृत रग-रग तन की,
रेशा-रेशा लहराया
मन की हर विस्मृति टूटी !
  
उड़ चली डोर श्वासों की
मन ह्रदय पतंग हो उठा,
तोड़ सभी तन के बंधन  
  चिदाकाश में उड़ा किया !

इक लहर उठी श्वासों की
मानस धवल  हंसा हुआ,
 मृदु भावों के सरवर में
वह अनवरत तिरता रहा !

 इक पटल बना श्वासों का 
घिस-घिस कर चमकाया मन
जाग उठा चिन्मय झिलमिल 
  झलकाये अंतर दर्पण  !

 पुल बना सहज श्वासों का
जब मानस की धारा पर,
परम अनंत की खोज में
चल पड़ा ह्रदय  यायावर !
 
दीप जलाया श्वासों का
हुआ नूर भीतर-बाहर,
मन माणिक जगमगाया
अकम्पित उजली लौ पर  !

माला गुंथी श्वासों की
 शुभ सुमनों से ओंउम् के,
 प्रियतम की खोज में मनस
 ले  चला थाम हाथों में  !

डाली समिधा श्वासों की 
 हवन कुंड मन-अंतर में , 
परम सत्य तब प्रकट हुआ
ओंउम्.. ओंउम्... ओंउम्.. में !