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गुरुवार, जनवरी 20

हर इक राह सुगम हो जाए

हर इक राह सुगम हो जाए 


हर कंटक तेरे पथ का मैं 

चुन लूँ अपने इन हाथों से, 

हर इक राह सुगम हो जाए 

दुआ दे रहा है मन कब से !


अनजाने में पीड़ा बाँटी 

खुद से ही दूरी थी शायद, 

अब जबसे  यह भेद खुला है 

पल-पल पाती भेज रहा मन !


दुःख में  सिकुड़ गया अंतर्मन 

शोक लहर जिससे बहती है, 

पाला पड़ा हुआ धरती  पर 

सूर्य किरण झट हर लेती है  !


प्रीत उजाला जब प्रकटेगा 

खो जाएगा हर विषाद तब, 

उसके अनुपम उजियाले में 

झलकेंगे पाहन बन शंकर !


शुक्रवार, सितंबर 7

जीवन अमृत बहा जा रहा



जीवन अमृत बहा जा रहा


कितनी बार चुभे हैं कंटक
कितनी बार स्वप्न टूटे हैं,
फिर-फिर राग लगाता यह दिल
कितने संग-साथ छूटे हैं !

सुख की फसल लगाने जाते
किन्तु उगे हैं दुःख ही उसमें,
धन के भी अम्बार लगे हों
भीतर का अभाव ही झलके !

ऊपर चढ़ने की खातिर जब
कर उपेक्षा छोड़ा होगा,
लौट-लौट आयेंगे वे पल
कितनों का दिल तोड़ा होगा !

फूलों की जब चाहत की थी
काँटों के जंगल बोये थे,
जगें स्वर्ग में नयन खुलें जब
चाहा, लेकिन खुद सोये थे !

कैसे जीवन पुष्प खिलेगा
कोई तो आकर सिखलाये,
जीवन अमृत बहा जा रहा
कोई क्यों फिर प्यासा जाये !

शुक्रवार, फ़रवरी 6

अब जब कि


अब जब कि

अब जब कि हो गयी है सुबह
क्यों अंधेरों का जिक्र करें,
चुन डाले हैं पथ से कंटक सारे
क्यों पावों की चुभन से डरें !

अब जब कि छाया है मधुमास
अँधेरी सर्द रातों को भूल ही जाएँ,
खिले हैं फूलों के गुंचे हर सूं
क्यों दर्द को गुनगुनाएं !

अब जब कि धो डाला है मन का आंगन
आँधियां धूल भरी क्यों याद रहें,
सुवासित है हर कोना वहाँ
क्यों कोई फरियाद आये !

अब जब कि हो गया है मिलन
विरह में नैन क्यों डबडबायें
बाँधा है बंधन अटूट एक
भय दूरी का क्यों सताए !



शनिवार, अगस्त 2

हर लेता हर कंटक पथ का


हर लेता हर कंटक पथ का


तू गाता है स्वर भी तेरे
लिखवाता नित गान अनूठे,
तू ही गति है जड़ काया में
 बन प्रेरणा उर में पैठे !

तू पूर्ण ! हमें पूर्ण कर रहा
नहीं अपूर्णता तुझको भाती,
हर लेता हर कंटक पथ का
हरि बन सारी व्यथा चुरा ली !

किसका रस्ता अब जोहे मन
पाहुन घर में ही रहता है,
हर अभाव को पूर गया जो
निर्झर उर में बहता है !

तिल भर भी रिक्तता न छोड़े
वही उजाला बन कर छाया,
सारे खन्दक, खाई पाटे
समतल उर को कर हर्षाया !

इक कणिका भी अंधकार की
उस ज्योतिर्मय को न भाती,
एक किरण भी उस पावन की
प्रतिपल यही जताने आती !





मंगलवार, मार्च 13

मुक्ति के सँग बंधन भी है


मुक्ति के सँग बंधन भी है


सोते-सोते युग बीते हैं
अब तो जाग जरा मन मेरे,
चौराहे पर आ पहुँचा है
ठिठके कदम भला क्यों तेरे !

जाने कब यह नैन मुंदेगें
उससे पूर्व नहीं खिलना है ?
सुरभि लिये क्या जाना जग से
बन सूरज जग से मिलना है !

कुदरत तेरी ओर निहारे
इक संकल्प जगा कर देख,
मंजिल राह तका करती है
खींच क्षितिज तक रक्तिम रेख !  

 तज दे तंद्रा सुबह सामने
इक उड़ान भर छूले अम्बर,
दुःख चादर को झट उतार दे
सुख समीर बह रही झूमकर !

अलस बिछौना कब तक भाए
फूलों के सँग कंटक भी हैं,
घटे नहीं जागरण जब तक
मुक्ति के सँग बंधन भी है !