हर इक राह सुगम हो जाए
हर कंटक तेरे पथ का मैं
चुन लूँ अपने इन हाथों से,
हर इक राह सुगम हो जाए
दुआ दे रहा है मन कब से !
अनजाने में पीड़ा बाँटी
खुद से ही दूरी थी शायद,
अब जबसे यह भेद खुला है
पल-पल पाती भेज रहा मन !
दुःख में सिकुड़ गया अंतर्मन
शोक लहर जिससे बहती है,
पाला पड़ा हुआ धरती पर
सूर्य किरण झट हर लेती है !
प्रीत उजाला जब प्रकटेगा
खो जाएगा हर विषाद तब,
उसके अनुपम उजियाले में
झलकेंगे पाहन बन शंकर !


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