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सोमवार, जून 16

कैसे मन की गागर भरती


कैसे मन की गागर भरती


कितने पल ख़ाली बीते हैं 
अक्सर हम यूँ ही रीते हैं, 
भर सकते थे उर उस सुख से 
जिसकी ख़ातिर ही जीते हैं !

किंतु नज़रें सदा अभाव पर 
कैसे मन की गागर भरती, 
भय से छुपे रहे गह्वर  में 
रिमझिम जब धाराएँ झरती !

निज शक्ति पर डाले पहरे 
निज आनंद की खबर नहीं थी, 
पीठ दिखाकर ज्योति पुंज को 
अंधकार की बाँह गही थी !

जाने कैसा मोह व्याप्त है 
ख़ुद से ही मन दूर भागता, 
दुनिया भर की खोज-खबर ले 
पल भर भीतर नहीं झाँकता !

शनिवार, मई 31

कामना का अभाव

कामना का अभाव 


जैसे धुएँ से ढकी रहती है अग्नि 

और धूल से दर्पण 

वैसे ही ढक जाती है चेतना 

कामना के आवरण से 

उजागर नहीं होने देती सत्य 

अनावृत मन ही हो जाता अनंत

हर कामना यदि अर्पित हो जाये 

रिक्त अन्तर में विश्वास यह भर जाये 

 पल-पल कुशल-क्षेम कोई रखे ही जाता 

तो हर बार वार अभाव का ख़ाली चला जाता 

पूर्णता की तलाश हर अभाव को मिटाना है 

मुक्त हो हर प्रभाव से, स्वभाव में आ जाना है ! 


रविवार, अप्रैल 6

मौन की गूँज

मौन की गूँज 


सन्नाटा बहता जाता है 

नीरवता छायी है भीतर, 

खामोशी सी पसर रही है 

गूंज मौन गूँजे रह-रह कर !


तृप्ति सहज  धारा उतरी ज्यों 

सारा आलम भीग रहा है, 

ज्योति स्तंभ का परस सुकोमल 

हर अभाव को पूर रहा है !


चाहत की फसलें जो बढ़तीं 

काटीं किसने कौन बो रहा, 

जगत का यह प्रपंच सुहाना 

युग-युग से अनवरत चल रहा !


बुधवार, अक्टूबर 4

भावों का अभाव उर खलता


भावों का अभाव उर खलता


बनता सहज अभाव का भाव

 भावों का अभाव उर खलता

टिकी ‘नहीं’ पर  नज़र  सदा ही 

मन ‘है’ को  देख नहीं पाता  !


जग, सोने का अभिनय करता

नूतन रंग सपन में भरता,

पल दो पल का भ्रम है सपना 

 सत्य  देखने से यह डरता  !


 कठिन जगाना जगे हुए को

 जल से तेल न होता हासिल,

फिर भी जतन यहाँ जारी है 

दूर दिखायी देता साहिल !


कभी होश आ खुलेगी आँख 

नभ निज होगा जगेंगी पाँख,

देर न हो जाये डर यह है

रिसता जीवन लाखों सुराख !


रविवार, जनवरी 16

जब जागो तभी सवेरा है

जब जागो तभी सवेरा है 


चढ़ आया हो सूरज नभ पर 

निद्रा में गहन अँधेरा है, 

सही कह गए परम सयाने 

जब जागो तभी सवेरा है !


सोए-सोए युग बीते हैं 

जाने कब आँख खुले अपनी, 

निज हाथों से छलते खुद को 

तज पाते नहीं जब आसक्ति !


कुदरत चेताती है हर पल 

हम आदतों के ग़ुलाम बने, 

गुरु के वचनों को सदा भुला 

मन्मुख होकर जीते रहते !


जब बारी आती तजने की 

हम झट प्रकाश को तज देते, 

वह अंतर्यामी जाग रहा 

दस्तक ना उसके दर देते !


वह हर अभाव को हर लेता 

उसकी छाया में सब पलते, 

कोई कमी नहीं शेष रहे 

यदि उसके जैसे हो पाते !


सोमवार, जून 7

भाव-अभाव

भाव-अभाव

अभाव का काँटा जब तक चुभता रहेगा उर में 

भाव की धारा क्यों कर बहेगी 

जो ‘नहीं’ है ‘नहीं’ हो रहा है 

उस पर ही नज़र टिकी रही तो 

भय की कारा से छुट्टी क्यों कर मिलेगी 

बाहर ही बाहर यदि मन को लगाया 

तो पीड़ा और संताप दिखेगा 

अंतर गुहा में पल भर बिठाया 

तो श्रद्धा का फूल स्वयं खिलेगा 

खंडित विश्वास, टूटती आस्था की नींव पर 

नहीं टिकती भक्ति की इमारत 

पूर्ण की चाह है तो पूर्ण हो भरोसा 

तभी जीवन में सुरभि भरेगी !


मंगलवार, जून 23

भाव और अभाव

भाव और अभाव
 
जो भी दुःख है...  अभाव से उपजा है 
जो भी इच्छा है...  उस अभाव को दूर करने की है 
जो भी कर्म है...  उस इच्छा को पूरा करने के लिए है 
समीकरण सीधा है 
अभाव का अनुभव ही कर्म में लगाता है 
 
सिर पर छत हो 
घर में दाने हों 
तन ढका हो 
तब तो गिर जायेगा अभाव ?
 
नहीं, मन एक नया अभाव उत्पन्न करेगा 
 
 सुंदर सन्तान हो 
 प्रिय का संग हो 
समाज में नाम हो 
तब तो मिट जायेगा न अभाव ?
 
नहीं, मन कुछ और अभाव जगा देगा 
 
बैंक में नामा हो 
तन भी स्वस्थ हो 
सुख का हर साधन हो 
तब ? 
 नहीं, अभाव उत्पन्न करना ही मन का स्वभाव है 
 
और जीवन के अंतिम क्षण तक 
उसे पूरा करते रहना मानव की विवशता 
जब तक वह यह जान न ले 
कि अधूरा मन नहीं वास्तव में 
वह पूर्ण है ! 
 
तब हर कर्म पूर्णता से उपजेगा 
वही होगा कृष्ण का निष्काम कर्म 
जो अभाव से नहीं भाव से होता है आयास
बाँधता नहीं बाँटता है जग में निज सुवास ! 

शुक्रवार, जून 16

ओ मेरे मन !

ओ मेरे मन !


ओ मेरे मन !
जरा थम तो सही
कर पहचान खुद से
हजार छिद्रों वाला तू
पूर्ण क्योंकर हो सकेगा
अभाव यह तेरा कभी न भरेगा
तू मान ही ले
यह सच्चाई आज जान ही ले

तुझे ऐसा ही बनाया है
ऊपरवाले ने ही खेल रचाया है
तू कभी गाता कभी रोता है
दोनों बार ही नयन भिगोता है
दो कलों के मध्य डोलता रहता
कभी न खुद के करीब होता है

ओ मेरे मन !
थम जायेगा तू जिस पल
रुक जाएगी तेरी हलचल
जानेगा अपने कूल को
प्रकाश के उस मूल को


शनिवार, अगस्त 2

हर लेता हर कंटक पथ का


हर लेता हर कंटक पथ का


तू गाता है स्वर भी तेरे
लिखवाता नित गान अनूठे,
तू ही गति है जड़ काया में
 बन प्रेरणा उर में पैठे !

तू पूर्ण ! हमें पूर्ण कर रहा
नहीं अपूर्णता तुझको भाती,
हर लेता हर कंटक पथ का
हरि बन सारी व्यथा चुरा ली !

किसका रस्ता अब जोहे मन
पाहुन घर में ही रहता है,
हर अभाव को पूर गया जो
निर्झर उर में बहता है !

तिल भर भी रिक्तता न छोड़े
वही उजाला बन कर छाया,
सारे खन्दक, खाई पाटे
समतल उर को कर हर्षाया !

इक कणिका भी अंधकार की
उस ज्योतिर्मय को न भाती,
एक किरण भी उस पावन की
प्रतिपल यही जताने आती !





रविवार, अगस्त 11

गगन अपना लगेगा जगेंगी पाँखें

गगन अपना लगेगा जगेंगी पाँखें



अभावों का भाव नजर आता है
भावों का अभाव खले जाता है,
‘नहीं है’ जो, टिकी उस पर दृष्टि  
जो ‘है’, कोई देख नहीं पाता है !

जगे, पर सोने का अभिनय करते
नित नूतन रंग सपनों में भरते,
जानते, पल दो पल का भ्रम ही है
सामना सत्य का करने से डरते !

जागे हुओं को जगाना है मुश्किल
पानी से तेल नहीं होता हासिल,
फिर भी कोशिश किये जाते हैं वे  
दूर निकले जो कैसे पायें साहिल !

कभी तो होश आएगा खुलेंगी आँखें
गगन अपना लगेगा जगेंगी पाँखें,
देर न हो जाये बस डर यही है
रिस रहा जीवन हैं लाखों सुराखें !





शुक्रवार, जुलाई 19

यह कैसी विरासत

यह कैसी विरासत


बच्चा प्रेम से भरा आता है जग में
कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत
अक्सर दबा ही रह जाता है
भीतर प्रेम का बीज
जिसे सींचना था स्नेहिल स्पर्श से
झोंक दिया जीता है प्रतिस्पर्धा की आग में
उसे जल्दी ही....
कभी खा जाती है अभावों की आग
कभी अन्याय और असामनता का जहर
मिला दिया जाता है
उसके भोजन और पानी में
मारो, काटो की भाषा सिखाई जाती है
 मारो कीटों को
काटो जंगलों को, जानवरों को
नहीं सिखाते भाषा सह-अस्तित्व की
नहीं पढ़ाते
सहयोग की रीति और सुनीति
प्रकृति से दूर होते ही
आदमी जैसे बदल जाता है
और अपनी ही संतति को
विरासत में मृत्यु दिए जाता है...