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गुरुवार, जनवरी 20

हर इक राह सुगम हो जाए

हर इक राह सुगम हो जाए 


हर कंटक तेरे पथ का मैं 

चुन लूँ अपने इन हाथों से, 

हर इक राह सुगम हो जाए 

दुआ दे रहा है मन कब से !


अनजाने में पीड़ा बाँटी 

खुद से ही दूरी थी शायद, 

अब जबसे  यह भेद खुला है 

पल-पल पाती भेज रहा मन !


दुःख में  सिकुड़ गया अंतर्मन 

शोक लहर जिससे बहती है, 

पाला पड़ा हुआ धरती  पर 

सूर्य किरण झट हर लेती है  !


प्रीत उजाला जब प्रकटेगा 

खो जाएगा हर विषाद तब, 

उसके अनुपम उजियाले में 

झलकेंगे पाहन बन शंकर !


शनिवार, नवंबर 21

देखे वह अव्यक्त छिपा जो


देखे वह अव्यक्त छिपा जो

कंकर-कंकर में है शंकर 

अणु-अणु में बसते महाविष्णु, 

ब्रह्म व्याप्त ब्राह्मी सृष्टि में 

क्यों भयभीत कर रहा विषाणु !


वास यहाँ जर्रे-जर्रे में 

अलख निरंजन वासुदेव का, 

इस धरती पर जटा बिखेरे 

गंगा धारी महादेव का !


मन में हो विश्वास घना जब 

देखे वह अव्यक्त छिपा जो, 

अपरा-परा शक्तियां उसकी 

 कहा स्पष्ट कान्हा ने जिसको !


जिसने रचा खेल यह सारा 

कैसे वह अनभिज्ञ रहेगा,

उसके ही हम बनें खिलाड़ी 

जग यह सारा खेल लगेगा ! 

 

मंगलवार, अक्टूबर 27

हम और अस्तित्व

हम और अस्तित्व

 

हम वह वृक्ष बन सकें

जो हजारों का भला करता है

छाँव देता और उनकी क्षुधा हरता है

या बनें बाँसुरी जो खाली है भीतर से

पर अस्तित्व के अधरों से लगकर

मधुर संगीत जिससे उपजता है

हमारे भीतर से हम जब लुप्त हो जाते हैं

सारा संसार समा  जाता है

हवाएं बहने लगती हैं

शक्ति का प्रवाह ऊपर से गिरता है

जैसे शंकर की जटाओं में सिमट जाती है गंगा

बहती है वह जग की तृषा हरने

गौरी धरती है भीषण काली का रूप

सहना होगा जिसे असुरों का आक्रमण

हजार विरोध भी, पर वहाँ कोई नहीं होगा

जो अपमानित हो सके तिल भर

हमें भी बनना होगा मसीहा

छोटा या बड़ा  

क्योंकि अंतरिक्ष समेटे है हर कोई अपने भीतर !

  

शुक्रवार, अगस्त 7

जीवन की गागर


जीवन की गागर

बड़ा हो कितना भी सूरज का गोला
विशाल हो कितना भी ब्रहमांड
अरबों-खरबों हों सितारे
गहरे हों सागर या ऊँचें हों पर्वत
जीवन उन सबसे बड़ा है
जीवन जो पलता है एक नन्हे पादप में
चींटी की लघु काया में
जीवन जो बन सकता है
मेधा कृष्ण में, प्रज्ञा गार्गी में
या प्रतिभा शंकर में
सोये हुए हम जान नहीं पाते
सपनों में खोये पहचान नहीं पाते
जीवन फिसलता जाता है हाथों से
चेतना जो निकट ही थी
दूर ही रहे जाती है
एक बार फिर जीवन की गगरी
बिन पिए खो जाती है !  

शनिवार, मार्च 9

महाशिवरात्रि के अवसर पर शुभकामनाओं सहित



शम्भो शंकर हे महादेव


शूलपाणि, हे गंगाधर, हे महादेव, औघड़ दाता
हे त्रिपुरारी, शंकर शम्भो, हे जगनायक, जग के त्राता !

हे शिव, भोले, मृत्युंजय हे, तुम नीलकंठ, जटाधारी
हो आशुतोष, अनंत, अनादि, हे अडोल, नागधारी !

 हे अंशुमान, त्रिनेत्रधारी, अभयंकर, हे महाकाल
विश्वेश्वर, हे जगतपिता, हे सुंदर आनन, उच्च भाल !

कैलाशपति, हे गौरीनाथ, हे शक्तिमान, डमरू धारी
हे महारूद्र, काल भैरव, तुम भूतनाथ, गरल धारी !  

हे शार्दूल, हो तेजपुंज, हे सर्वेश्वर, नन्दीश्वर हे
त्रयम्बक, पशुपतिनाथ, हे आदिदेव हर हर हर हे !

हे विरूपाक्ष, निराकार, हे महेश, चन्द्रशेखर
सदाशिवं, हे चिदानंद, विशम्भर, हे शैलेश्वर !

भस्म विभूषित, करुणाकर, प्रलयंकर, सुंदराक्ष
हे विश्वात्मा, तुम जगतबीज, ताण्डवकर्ता, हे नटराज !  

महेश्वरा, त्रिभुवन पालक, काशीनाथ हे जगदीश्वर
नमोः नमः हे शम्भुनाथ, नमोः नमः हे सोमेश्वर !

तुम बहाते ज्ञान गंगा, मौनधारी तत्व हो तुम
हे अडोल पर्वत जैसे, कैलाश पति अमृत हो तुम !

विमल तुम्हारा मन भी, ज्यों शुभ्र श्वेत धवल हिम
अंतर्ज्योति से जलते भीतर, आकार है ब्रह्मांड सम !

गुरुवार, दिसंबर 1

नर्तक एक अनोखा देखा


नर्तक एक अनोखा देखा 



मुंदी पलक में स्वप्न थिरकते, उपवन-उपवन पुष्प नाचते !
शिशु कोख में माँ में आशा, बीज धरा में उर अभिलाषा,

नित्य नाचते पल्लव, किसलय, सँग नाचते मृण्मय, चिन्मय ! 
श्वासें नाचें रक्त नाचता, शंकर नाचें, भक्त नाचता,

हवा नाचती, स्थाणु नाचें, अणु-अणु, परमाणु नाचें ! 
नृत्य समाया लहर-लहर में, दृष्टि नाचती डगर-डगर में,

शब्द नाचते कवि कलम में, भाव नाचते पाठक दिल में !
नृत्यांगना के चरण थिरकते, छेनी नाचे प्रस्तर तन पे,

वीणा की स्वरलहरी नाचे, मीरा के पग घुंघरू नाचे ! 
कृष्ण नाचते राधा नाचे, वन-जंगल में मोर नाचते,

नृत्य कर रही है हर रेखा, नर्तक एक अनोखा देखा !

धूप नाचती नाचे छाया वृक्ष नाचते नाचे काया,