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गुरुवार, अगस्त 18

प्रेम की भाषा बोले कृष्ण

प्रेम की भाषा बोले कृष्ण 

नन्द-यशोदा अपलक निरखें 
बाल कन्हैया का शुभ मुखड़ा, 
धन्य हुई ब्रज की धरती पा 
नीलमणि सम चाँद का टुकड़ा ! 

मोर मुकुट पीतांबर धारे 
घुंघराली लट ललित अलकें, 
ओज टपकता मुखमंडल से 
नयनों से ज्यों मधुघट छलकें ! 

प्रतिदिन ग्वालों सँग गोचारण
यमुनातट वंशीवट घूमें, 
वंशी धुन सुन थिरकें ग्वाले 
पशु, पक्षी, पादप मिल झूमें !

कृष्ण, कन्हैया, माधव, केशव
मोहन, गिरधारी, वनमाली, 
अनगिन नाम कई लीलाएं 
वृन्दावन में ही रच डालीं !

प्रेम की भाषा बोले कृष्ण 
प्रेम सुधा में भीगी राधा, 
प्रेमिल बंधन स्नेहिल धागा 
गोकुल में सभी से  बांधा !

मंगलवार, सितंबर 1

कान्हा की हर बात निराली

कान्हा की हर बात निराली  




यमुना तट पर वृंदावन में
पुष्पित वृक्ष कदम्ब का सुंदर,
अति रमणीक किसी कानन में
जिस पर बैठे हैं मधुरेश्वर !

पीताम्बर तन पर धारे हैं
चन्दन तिलक सुगन्धित माला,
मंद हास से युक्त अधर हैं
कुंडल धारे वंशी वाला !

गोपों ग्वालों संग विचरते
गउओं ने जिनको घेरा है,
राधा प्रिय गोपी जन वल्लभ
जिनके उर सुख का डेरा है !

कालिय नाथ नथा सहज ही
गिरधर मोहन माखन चोर,
जिसने मारे असुर अनेकों
जन-जन बांधी उर की डोर !  

बादल भी रुक कर सुनते हैं
कान्हा की मुरली का गीत,
हिरन, मयूर चकित हो तकते
थम जाता कालिंदी नीर !