प्रेम की भाषा बोले कृष्ण
नन्द-यशोदा अपलक निरखें
बाल कन्हैया का शुभ मुखड़ा,
धन्य हुई ब्रज की धरती पा
नीलमणि सम चाँद का टुकड़ा !
मोर मुकुट पीतांबर धारे
घुंघराली लट ललित अलकें,
ओज टपकता मुखमंडल से
नयनों से ज्यों मधुघट छलकें !
प्रतिदिन ग्वालों सँग गोचारण
यमुनातट वंशीवट घूमें,
वंशी धुन सुन थिरकें ग्वाले
पशु, पक्षी, पादप मिल झूमें !
कृष्ण, कन्हैया, माधव, केशव
मोहन, गिरधारी, वनमाली,
अनगिन नाम कई लीलाएं
वृन्दावन में ही रच डालीं !
प्रेम की भाषा बोले कृष्ण
प्रेम सुधा में भीगी राधा,
प्रेमिल बंधन स्नेहिल धागा
गोकुल में सभी से बांधा !
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