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सोमवार, फ़रवरी 8

नाविक भी हो मीत पुराना

नाविक भी हो मीत पुराना


सुख का सागर सभी चाहते 

दुःख के ग्राह वहीं रहते हैं,

नैया एक अगर पा जाएँ 

उस तट पहुँचें यह कहते हैं !


हो नाव में सुराख़ न कोई 

नाविक भी हो मीत पुराना,

लहरों पर उठते-गिरते ही 

कट जायेगा सफर सुहाना !


देह ही तरणि मन है नाविक 

अब सब जांच परख लें ऐसे, 

मिले प्रकृति से इसी काज हित

दुःख जन्माये इनसे कैसे ?

 

मंगलवार, जुलाई 17

ये इशारे हैं उसी के



ये इशारे हैं उसी के

वह जो धुन गहरे तक उतर जाती है
कूक कोकिल की रह-रह के सताती है
ये जो रातों को झांकते हैं तारे
चाँदनी झरोखे से बिछौने पे बिछ जाती है
और... झीलों में जो खिलते हैं कमल
तिरें फूलों से भरी कश्तियाँ सुंदर
ये इशारे हैं उसी के याद रखना यह सदा
संदेस भेजे हैं उसी ने.. हमारे ही लिये....


झांकता सूर्यमुखी जब जानिब सूरज की
ताकता मोर बादलों की तरफ जब भी
पुकार उठती अकेली नाव से माझी की
निहारती कोई बाला जाने राह किसकी
यह जो तलाश जारी है दिलों में प्रेम की
ये चाहत है उसी की याद रखना यह सदा
ये जाल बिछाए हैं उसी ने.. हमारे ही लिये..  


यह जो पुरवाई चली आयी नमी ले मीलों से
उड़ी जातीं पंक्तियाँ हंसों की अम्बर पे
ये जो बिखरा है तब्बसुम चेहरों पे तितलियों के
किलक गूंजती है नन्हों की बसेरों में
ये सौगाते हैं उसी की याद रखना यह सदा
ये बातें हैं उसी की.. हमारे ही लिये..