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गुरुवार, नवंबर 13

ग्रीष्म की एक संध्या

ग्रीष्म की एक संध्या



छू रही गालों को शीतल ग्रीष्म की महकी पवन
छा गए अम्बर पे देखो झूमते से श्याम घन 

दिवस की अंतिम किरण भी दूर सोने जा रही
सुरमई संध्या सुहानी कोई कोकिल गा रही

कुछ पलों पहले हरे थे वृक्ष काले अब लगें
बादलों के झुण्ड जाने क्या कथा खुद से कहें 

छू रही बालों को आके कर रही अठखेलियाँ
जाने किसको छू के आयी लिये नव रंगरेलियाँ 

चैन देता है परस और प्यास अंतर में जगाता
दूर बैठ एक चितेरा कूंची नभ पर है चलाता 

झूमते पादप हंसें कलियाँ हवा के संग तन
नाचते पीपल के पत्ते खिलखिला गुड़हल मगन 

गर्मियों की शाम सुंदर प्रीत के सुर से सजी
घास कोमल हरी मानो रेशमी चादर बिछी 

है अँधेरा छा गया अब रात की आहट सुनो
दूर हो दिन की थकन अब नींद में सपने बुनो 

मंगलवार, मार्च 5

मन बहता हुआ इक धारा था जब


मन बहता हुआ इक धारा था जब


डोलने लगे थे पात पीपल के
जरा नजर भर के निहारा था जब,
तरल हो गया था आलम सारा
निःशब्द होकर उसे पुकारा था जब !

है भी जो, नहीं भी, नजर आया था
दूर सागर का किनारा था जब,
झील का चाँद किसी की खबर लाया
पार उतरने को शिकारा था जब !

मिलीं ढेर नसीहतें, संग उसके
दिल को बस यही न गवारा था जब,
बहा ले गया गम, खुशियाँ सारी
मन बहता हुआ इक धारा था जब !