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शनिवार, मार्च 14

टूट जाते हैं स्वप्न

टूट जाते हैं स्वप्न

स्वप्न देखा है मानव ने

 न जाने कितनी-कितनी बार

लायेगा चिर स्थायी शांति

इक दिन वह

स्वर्ग से धरा पर उतार

चैन की श्वास लेंगे जब जन

 बहेगी प्रीत की बयार.. 

नहीं चलेगा, मौत का सामान

बेचने वालों का कारोबार

चाहता रहा है यही दिल उसका

 देता रहा है यही पुकार

खत्म होगा वैर, साथ

होड़ भी हथियारों की

 सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर

नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए

न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल

विजय होगी सौहार्द की 

जीतेंगे ज्ञान और बल !

बनेगा नव समाज श्रम से

नहीं होगा अभाव न भूखा कोई

खिलेंगी सभी प्रतिभाएं

 नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में

स्वप्न देखा है मानव ने

यह हजारों बार

पर टूट जाते हैं स्वप्न

और हकीकत

बहुत ज़ोर से तमाचा लगाती है 

मानवता मुँह बायें खड़ी देखती रह जाती है ! 


मंगलवार, नवंबर 1

नव भारत का निर्माण करें

नव भारत का निर्माण करें 


स्वर्णिम युग इस भू पर लाने 

योग धर्म का ध्वज लहराने, 

व्यर्थ जले,  रहे शेष सार्थक

मिलकर हम यही प्रयास करें !


नव भारत का निर्माण करें !


तोड़ें हर गढ़ रूढ़िवाद का 

कट्टरता औ' मिथ्या हठ का, 

झूठे दुर्ग, क़िले जो भीतर 

मतान्धता के सम्पूर्ण गिरें !


नव भारत का निर्माण करें !


नए हृदय की कोमल भू पर 

चट्टानों सम निर्णय लेकर,  

शिव जैसे कैलाश विराजें 

मानवता  उच्च  उड़ान भरे !


नव भारत का निर्माण करें !


किसने रोका है कदमों को 

स्वार्थ हृदय से झर जाने को,  

प्रतिपल बने चेतना पावन 

शुभ मुल्यों  का सम्मान करें !


नव भारत का निर्माण करें !


रविवार, नवंबर 29

कोई एक

 कोई एक 

युगों-युगों से बह रही है 

मानवता की अनवरत धारा 

उत्थान -पतन, युध्द और शांति के तटों पर 

रुकती, बढ़ती 

शक्तिशाली और भीरु 

समर्थ और वंचित को ले  

आह्लाद और भय का सृजन करती 

विशालकाय और सूक्ष्मतम 

दोनों को आश्रय देती सदा 

कोई एक इस धार से छिटक 

तट पर आ खड़ा होता है 

विचार की शैवाल से पृथक कर खुद 

मान्यताओं और पूर्वाग्रहों के 

भँवर से निकल 

मोतियों का मोह त्यागे 

नितांत एकाकी सूने तट पर 

देखता है बड़ी मछलियों से भयभीत हैं छोटी 

देखता है वही दोहराते हुए 

जगत पुनःपुनः निर्मित होते औ' नष्ट होते 

आवागमन के इस चक्र से वह बाहर है !


शुक्रवार, अगस्त 7

हर दिल की यही कहानी है

 हर दिल की यही कहानी है 


कुछ पाना है जग में आकर 

क्या पाना है यह ज्ञात नहीं, 

कुछ भरना है खाली मन में 

क्या भरना है आभास नहीं !

 

जो नाम कमाया व्यर्थ गया 

अब भी अपूर्णता खलती है, 

जो काम सधे पर्याप्त नहीं 

भीतर इच्छाएँ पलती हैं !

 

कर-कर के भी शमशान मिला

ना कर पाए जो पीड़ित है, 

माया मिली न ही राम मिला 

हर दिल की यही कहानी है !

 

था सार्स अभी कोरोना है 

सोयी मानवता जाग उठे, 

निज सुख खातिर दुःख न बांटें 

हर प्राण बचे जो, पाठ पढ़े !

 

क्यों भीतर झाँक नहीं देखा  

वह पूर्ण जहाँ का वासी है, 

वह दूजा न ही पराया है 

निज भाव स्रोत अविनासी है !


शनिवार, अप्रैल 11

आकर ही रहता है प्रभात

आकर ही रहता है प्रभात


हमें आकाश से उतारा गया 
सड़कों से भगाया गया 
रेल, बस, कार, साईकिल सभी हुए वर्जित 
बाजार, मॉल, थियेटर से किये गए निष्कासित 
किया गया कैद अपने ही घरों में 
निर्वासित हुए हम नगरों, गाँवों से 
थम गए हैं घर-आंगन में कदम 
जिसकी कद्र करना भूल गए थे हम 
बन गया था जो 
केवल एक रात्रि आश्रय स्थल 
जहाँ से भागा फिरते थे, ढूंढते कुछ राहत के पल  
आदत हो गयी थी शहर-शहर घूमने की
पर्यटन स्थलों पर कितनी भीड़ जमा कर दी 
हमने घरों को साफ रखा 
पर बाजारों को गंदा किया 
पहाड़ों को मैला किया 
नदियों, जंगलों की नैसर्गिकता को हर लिया 
हमने धन को विलासता में उड़ाना चाहा
पर प्रकृति कुछ और ही चाहती थी 
उसने हमें सत्य से अवगत कराया 
हमें अपनी सीमा दिखाई 
लाखों बेघरों की मजबूरी से मिलवाया 
अपने ही देश में पनप रही 
दकियानूसी सोच से रूबरू करवाया 
स्वच्छता की नई परिभाषा सिखाई 
जीने की नई राह दिखाई 
परिवार को जोड़ने का मन्त्र दिया 
एक सुखमय सादी जीवनशैली का सूत्र दिया 
माना कोरोना ने छीन लिया है मानवता से बहुत कुछ 
थोड़ा सा लौटाया भी है 
मेडिकल प्रोफेशन को सम्मान खोया हुआ 
पुलिस को एक नए अवतार में प्रस्तुत किया 
केंद्र व राज्यों में एका सिखाया 
देशवासियों को  एक सूत्र में बाँधा 
अभी लड़नी है एक लम्बी लड़ाई 
नई ऊर्जा और विश्वास के साथ 
अँधेरा कितना भी घना हो 
आकर ही रहता है प्रभात !