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बुधवार, अगस्त 12

गोकुल बना महकता उर यह

 गोकुल बना महकता उर यह 

 

टूट गए जब ताले मन के 

खुलीं बेड़ियाँ मोह, अहम की, 

गोकुल बना महकता उर यह 

प्रकट भये श्यामा सुंदर भी !

 

वह चितचोर नन्द का लाला 

आनँदघन हरि मुरलीवाला, 

निर्मल मन नवनीत बना जब  

उस घट आकर डाका डाला !

 

प्रेम-विरह दोनों का रसिया 

अविचल भक्ति सुरस बरसाये, 

नित नई चुनौती स्वीकारे 

रास रचाने झट आ जाये !

 

अव्यक्त ब्रह्म पूर्ण व्यक्त हो 

वृन्दावन के श्याम सरीखा, 

चंचल, धीर, योगी व ज्ञानी  

मीत कन्हैया सखा अनोखा !


गुरुवार, सितंबर 15

भोर नयी थामे जब अंगुली

भोर नयी थामे जब अंगुली

महक रहा कण-कण सृष्टि का
अनजानी सी गंध बहे है,
गुंजित गान सुरीले निशदिन
जाने किससे कौन कहे है !

पलकों में तंद्रा भर जाता
स्वप्न दिखा ताजा कर जाता,
भोर नयी थामे जब अंगुली
नये मार्ग हर रोज सुझाता !

रचे रास अदृश्य कन्हाई
तन का पोर-पोर हुलसाता,
झांक रहा नीले नयनों से
साँझी प्रीत उड़ेंले जाता !