एक बीज बोया अंतर में
ऊपर कितना ही साधा हो
एक खोज भीतर चलती है,
नहीं यहाँ विश्राम किसी को
सदा वही पथ पर रखती है !
किन्तु अनोखे राहीगर हम
हर पड़ाव पर खेमे गाड़े,
जैसे मिल ही गयी हो मंजिल
हुए बेखबर खुद से हारे !
जाग रहा है भीतर कोई
रहे ताकता पल-पल जैसे,
बाहर ही बाहर हम तकते
मिलन घटे फिर उससे कैसे !
है अनंत धैर्यशाली वह
किन्तु डसे अधीरता मन को,
प्रीत पगा वह सहज डोलता
मुरझाया उर तपन सहे जो !
श्वासों की अलख डोरी सा
मिल सकता पर नहीं मिला है
एक बीज बोया अंतर में
खिल सकता पर नहीं खिला है !
