राहीगर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राहीगर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, मार्च 6

एक बीज बोया अंतर में


एक बीज बोया अंतर में


 ऊपर कितना ही साधा हो 
एक खोज भीतर चलती है, 
नहीं यहाँ विश्राम किसी को 
सदा वही पथ पर रखती है !

किन्तु अनोखे राहीगर हम 
हर पड़ाव पर खेमे गाड़े,
जैसे मिल ही गयी हो मंजिल
हुए बेखबर खुद से हारे !

जाग रहा है भीतर कोई 
रहे ताकता पल-पल जैसे,
बाहर ही बाहर हम तकते 
मिलन घटे फिर उससे कैसे !

है अनंत धैर्यशाली वह 
किन्तु डसे अधीरता मन को,
प्रीत पगा वह सहज डोलता 
मुरझाया उर तपन सहे जो !

श्वासों की अलख डोरी सा 
मिल सकता पर नहीं मिला है 
एक बीज बोया अंतर में 
खिल सकता पर नहीं खिला है !