शरण गए बिन बात न बनती
अंधकार मन का जो हरता
ज्ञान मोतियों से उर भरता
उसकी महिमा कही न जाती
गुरुद्वार पर भीड़ उमड़ती
शरण गए बिन बात न बनती
शरण गए बिन बात न बनती !
हर पीड़ा का कारण जाने
भीतर बाहर वह पहचाने
परम सत्य तक खुद ले जाता
उसके निकट अभय मन पाता
आँखों से शुभ कृपा झलकती
शरण गए बिन बात न बनती !
अहम आवरण वही गिराए
सहज ही सुख राह पर लाये
एक आस विश्वास वही है
उससे दिल की बात कही है
वरना कौन सहारा जग में
किसी ठौर नहीं मुक्ति आती
शरण गए बिन बात न बनती !
