शुक्रवार, दिसंबर 4

लहराएगा मुक्त गगन में

लहराएगा मुक्त गगन में


अभी खोल में ढका बीज है 
अभी बंद है उसकी दुनिया, 
उर्वर कोमल माटी  पाकर 
इक दिन सुंदर वृक्ष बनेगा !

जल से निर्मल भरे ताजगी
धरती से गर्माहट उर में, 
नृत्य पवन से भर-भर पल्लव  
लहराएगा मुक्त गगन में !

शाखाओं पर पंछी आकर 
बैठेंगे मृदु गान सुनाने,
फूलों के खिलने की आशा 
उस पादप के मन अंकुराने !

वही बीज फिर फूल बना नव
खिल जाएगा रूपरंग में, 
भँवरे तितली कीट अनेकों 
गुनगुन गाकर उसे रिझाएं 

मिलन घटेगा अस्तित्व से 
फल बनकर फिर बीज धरेगा, 
जहाँ से आ क्रीड़ा रची यह 
उस भू में रोपा जाएगा !

छुपा बीज में राज सृष्टि का 
खिलकर मुक्त हास जो बांटे, 
तृप्त हुआ वह उर मुस्काता 
सहज गुजर जाता इस जग से !

14 टिप्‍पणियां:

  1. अभी खोल में ढका बीज है
    अभी बंद है उसकी दुनिया,
    उर्वर कोमल माटी पाकर
    इक दिन सुंदर वृक्ष बनेगा !..जीवन और प्रकृति दोनो को जोड़ती हुई सुंदर कृति ..।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 04 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०५-१२-२०२०) को 'निसर्ग को उलहाना'(चर्चा अंक- ३९०६) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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  4. जब वो परम भाव चारों ओर से घेर लेता है तो शब्द असमर्थ हो जाते हैं कुछ कहने में । बस परम तृप्ति की दशा होती है यहां आकर ।

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    1. ह्रदय से स्वागत व आभार आप सभी सुधीजनों का !

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  5. बीज के माध्यम से जीवन सार्थक हो सके इसका प्रयास ... बहुत उत्तम ...

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