शुक्रवार, मार्च 19

उतना ही जल नभ से बरसे

उतना ही जल नभ से बरसे


जर्रे-जर्रे में बसा हुआ  

रग-रग में लहू बना बहता, 

वाणी से वह प्रकटे सबकी 

माया से परे सदा रहता !


छह रिपुओं को यदि हरा दिया 

उसके ही दर पर जा पहुँचे, 

अंतर में जितनी प्यास जगी 

उतना ही जल नभ से बरसे !


जाने कब से यह सृष्टि बनी 

परम संतों ने उसे पाया, 

जिसने अपने भीतर झाँका 

बस गीत उसी का फिर गाया ! 


 महादानी वह सर्व समर्थ 

दीनों का है रखवाला वह, 

जो श्रद्धा से भजता उसको 

अंतर उसको दे डाला यह ! 


पल भर भी उससे दूर नहीं 

वह अंतर्यामी बन रहता, 

जीवन इक सुंदर उत्सव है 

मन कष्टों को हँस कर सहता ! 


समता का भाव भरे दिल में 

वह सुख का पाठ पढ़ाता है, 

हर भेद दिलों से मिट जाए  

सेवा का मर्म सिखाता है !


उसकी महिमा क्या जग जाने 

जो अपनी राह चले जाता,  

पल में सोने को धूल करे 

 भू को पल में स्वर्ग बनाता !

 

16 टिप्‍पणियां:

  1. 'उसकी महिमा क्या जग जाने
    जो अपनी राह चले जाता,
    पल में सोने को धूल करे
    भू को पल में स्वर्ग बनाता !'


    बिल्कुल सही कहा आपने।

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  2. जर्रे-जर्रे में बसा हुआ

    रग-रग में लहू बना बहता,

    वाणी से वह प्रकटे सबकी

    माया से परे सदा रहता !


    छह रिपुओं को यदि हरा दिया

    उसके ही दर पर जा पहुँचे,

    अंतर में जितनी प्यास जगी

    उतना ही जल नभ से बरसे !


    जाने कब से यह सृष्टि बनी

    परम संतों ने उसे पाया,

    जिसने अपने भीतर झाँका

    बस गीत उसी का फिर गाया !


    महादानी वह सर्व समर्थ

    दीनों का है रखवाला वह,

    जो श्रद्धा से भजता उसको

    अंतर उसको दे डाला यह
    सत्य और सुंदर , बहुत ही बढ़िया, सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-03-2021) को    "फागुन की सौगात"    (चर्चा अंक- 4012)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  4. छह रिपुओं को यदि हरा दिया

    उसके ही दर पर जा पहुँचे,

    अंतर में जितनी प्यास जगी

    उतना ही जल नभ से बरसे !

    आपकी हर रचना गहन भाव लिए होती है ... मुझे दो बार तो पढनी ही पड़ती है :)
    बहुत सुन्दर भाव

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  5. आध्यात्मिकता और जीवन दर्शन से ओतप्रोत आपकी रचना बहुत हाई उत्कृष्ट है,आपको सादर नमन।

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  6. बहुत अच्छी कविता है यह आपकी अनीता जी । अपने-अपने ढंग से लोग इसके अर्थ निकाल सकते हैं और अपने-अपने विचारों के अनुरूप इससे प्रेरणा ले सकते हैं ।

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    1. सही कहा है आपने, जाकी रही भावना जैसी !

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  7. उसके गीतों को गाने के साथ-साथ आपके गीतों को भी हृदय गुनगुनाता रहता है । अति सुन्दर भाव के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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  8. वह एक परम पिता जो सब कुछ करता है और इस श्रीष्टि को चलाता है उसको होना ही प्राकश है जीवन में ...

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