बुधवार, मार्च 31

समर्पण की एक बूँद

समर्पण की एक बूँद


मन अंतर में दीप जले 

जब तक इस ज्ञान का कि 

  एक ही आधार है इस संसार का 

कि जीवन उसका उपहार है 

उस क्षण खो जाता अहंकार है 

वरना प्रकाश की आभा की जगह 

धुआँ-धुआँ हो जाता है मन 

कुछ भी स्पष्ट नजर नहीं आता 

चुभता है धुआँ स्वयं की आंखों में 

और जगत धुंधला दिखता है 

जो किसी और के धन पर अभिमान करे 

उसे जगत अज्ञानी कहता है 

फिर जो देन मिली है प्रकृति से 

उस देह का अहंकार !

हमें खोखला कर जाता है 

कुरूप बना जाता है 

स्वयं की प्रभुता स्थापित करने का  

हिरण्यकश्यपु का 

जीता जागता अहंकार ही थी होलिका

प्रह्लाद समर्पण है 

वह सत्य है, होलिका जल जाती है 

रावण जल जाता है जैसे 

अहंकार की आग में 

न जाने कितने परिवार जल रहे हैं 

समर्पण की एक बूँद ही 

शीतलता से भर देती है 

अज्ञान है अहंकार 

समर्पण है आत्मा 

चुनाव हमें करना है !


 

18 टिप्‍पणियां:

  1. समर्पण है आत्मा तभी जीवित रहती है ...
    अहंकार मिट जाता है ... होलिका की तरह ... रावण की तरह
    गहरा भाव लिए सुन्दर रचना ...

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  2. अज्ञान है अहंकार

    समर्पण है आत्मा

    चुनाव हमें करना है !बहुत अच्छी रचना है...खूब बधाई

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01-04-2021 को चर्चा – 4,023 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

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  4. कि जीवन उसका उपहार है

    उस क्षण खो जाता अहंकार है

    मन इतना चिंतन कर ले तो अहंकार हो ही नहीं सकता ... सुन्दर कृति

    वरना प्रकाश की आभा की जगह

    धुआँ-धुआँ हो जाता है मन

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    उत्तर
    1. संगीता जी, आपकी उपस्थिति रचना को नए अर्थ देती है, आभार !

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  5. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
    अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस की बधाई हो।

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  6. समर्पण का चुनाव ही उपयुक्त है। सुंदर सृजन के लिए बधाई।

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  7. ठीक कहा अनीता जी आपने - चुनाव हमें करना है, हमें ही करना है । आपके विचारों से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ ।

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  8. बहुत ही सुंदर लिखा है आपने ।

    जीता जागता अहंकार ही थी होलिका
    प्रह्लाद समर्पण है ।बहुत सुंदर.

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