सोमवार, फ़रवरी 21

जीवन - एक यात्रा

जीवन - एक यात्रा 


सुना है 

स्वयं से स्वयं तक की 

यात्रा का नाम है जीवन !


क्या स्वयं से भरे मन को 

स्वयं से ख़ाली करने की 

यात्रा का नाम भी ?


अथवा वास्तविक स्वयं से रिक्त मन से  

मायावी स्वयं को हटाने का नाम !


और मायापति  को बिठाने का भी ? 


या फिर स्वयं जो जानकार बना फिरता है 

उसे अज्ञानी बनाने की यात्रा का ?


जीवन एक सीमित भाव से 

असीम में प्रवेश की यात्रा भी तो  है !


कुछ होने से 

सब कुछ होने की 

जो कुछ न होने से गुजर कर ही 

सम्पूर्ण की जाती है ! 


13 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-2-22) को "प्यार मैं ही, मैं करूं"(चर्चा अंक 4348)पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. यात्रा का नाम है जीवन
    मन में गहरे तक उतरती
    सुंदर रचना
    बधाई

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  3. जीवन एक सीमित भाव से

    असीम में प्रवेश की यात्रा भी तो है !
    वाह! बहुत ही सुन्दर रचना 💐

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  4. बहुत सुंदर रचना,अनिता दी।

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  5. दर्शन से युक्त रचना।
    स्वयं से मुक्त हो स्व को खोज लेना यात्रा भर है लक्ष्य गर सिद्धत्व हो तो ।
    वैसे लक्ष्य भी स्व को पहचानते ही स्पष्ट हो जाता है।
    सुंदर चिंतन।

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  6. स्वयं को लक्ष्य बनाना मिलना छोड़ देना, गुम हो जाना ...
    बहुत गहरे सोच से उपजी रचना ...

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  7. ज्योति खरे जी, मनीषा जी, ज्योति जी, हर्ष जी, दिगम्बर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  8. बेहतरीन ।
    सुंदर जीवन संदर्भ ।

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  9. वर्तुलाकार ही तो है जीवन यात्रा... स्वयं से स्वयं तक।

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