सोमवार, दिसंबर 22

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - ३

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

अंतिम भाग


४ सितंबर २०२५ 

आज सुबह साढ़े आठ बजे हम बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए। सर्वप्रथम विष्णुप्रयाग पर रुके, जो जोशीमठ के निकट ही गढ़वाल और तिब्बत सीमा पर नीति दर्रे से निकलने वाली धौली गंगा और अलकनंदा के संगम स्थल पर स्थित एक तीर्थस्थान है। गाइड ने वहाँ पैदल जाने वाला वह रास्ता भी दिखाया, जिससे आधी सदी पहले लोग जाया करते थे। बद्रीनाथ पहुँचे तो चारों और हिमालय के उच्च शिखर दिखायी दिये, जिन पर ताजी बर्फ गिरी थी, जो चाँदी की तरह चमक रही थी। मंदिर के कपाट अभी बंद थे, सो हम भारत का प्रथम गाँव ‘माना’ देखने चले गये। वहाँ व्यास गुफा, गणेश गुफा तथा सरस्वती नदी का स्रोत देखा। सब कुछ अति विस्मय से भर देने वाला था। पाँच पाण्डवों, युधिष्ठर के कुत्ते तथा द्रौपदी की मूर्तियाँ भी वहाँ लगी थीं, उन्हें स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते हुए दिखाया गया था। दोपहर के भोजन में शारदेश्वर होटल में स्वादिष्ट मक्की की रोटी व सरसों का साग ग्रहण किया। हम पुन: मंदिर पहुँचे तो पता चला तीन बजे कपाट खुलेंगे, द्वार के सामने सीढ़ियों पर हम प्रतीक्षा करते हुए बैठे रहे। जब मंदिर का द्वार खुला पुजारी जी ने घंटनाद किया, जो काफ़ी देर तक चला और उसकी ध्वनि पूरे शहर में गूँजने लगी। दर्शन के बाद वापसी की यात्रा आरम्भ की। ड्राइवर ने हनुमान चट्टी के दर्शन दूर से ही कराये। शाम को साढ़े चार बजे हम वापस निवास स्थान पर लौट आये।



५ सितम्बर २०२५

आज सुबह भी साढ़े आठ बजे हम सुरजीत की गाड़ी में गोविंद घाट के लिए रवाना हुए। गोविंदघाट से जो पुल पुलना की तरफ़ जाता है, उसे पैदल ही पार करना होता है। हमारे बैग एक पिट्ठू वाले ने उठा लिए। वहाँ से एक जीप में बैठकर हम पुलना के लिए रवाना हुए। पिट्ठू वाला भी जीप में हमारे साथ ही बैठ गया। पुलना से हम घोड़े पर बैठकर घांघरिया पहुँच गये।पिट्ठू वाला सभी सामान पीठ पर टंगी टोकरी में रखकर ले आया। हमारा गाइड जेडी पैदल ही आया।रास्ते में कई पैदल यात्री भी मिले, अब उनमें से कुछ कल फूलों की घाटी में भी मिल सकते हैं। यहाँ भी हम ब्लू पॉपी के टेंट में ठहरे हैं। टेंट में सभी सुविधाएँ हैं, बिजली आ-जा रही है। दोनों समय का भोजन शंकर ने बनाया, भजन सिंह यहाँ का मैनेजर है। शाम को घांघरिया बाज़ार तक घूमने गये। कुछ फ्रिज मैगनेट ख़रीदे। कल सुबह साढ़े छह बजे हमें निकलना है। फूलों की घाटी जाने का स्वप्न साकार होने वाला है। 


 


७ सितंबर २०२५ 

कल शाम हम लौटे तो मन एक विचित्र उल्लास का अनुभव कर रहा था। फूलों से भला किसे प्रेम नहीं होगा और जब फूल ऐसे हों जो हिमालय की उच्च घाटियों में न जाने कब से अपने आप ही खिल जाते हैं। जिनके रंग और आकार सदियों से पर्यटकों और वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिकों को आकर्षित करते रहे हैं। लगभग चार दशक पूर्व स्कूल के दिनों में एक बार यहाँ आने का अवसर  मिला था। उस समय देखी फूलों की घाटी की स्मृति मन में कहीं गहरे बसी थी। ब्रह्म कमल की भीनी सुगंध और भोज पत्रों की छुवन मन की परतों में छिपी थी। उन पहाड़ों में की गयी यात्रायें दशकों तक बुलाती रहीं। उन दिनों हम चमोली ज़िले के गोपेश्वर नामक स्थान में रहते थे। आज वह पल पुन: आया, जब हिमालय ने अपने प्रांगण में बुलाया।बादलों की धूप-छाँव के मध्य फूलों की घाटी तक का सफ़र यादगार बन गया है, रास्ते भर अनेक झरने व तेज गति से दौड़ती पुष्पा नदी  के दर्शन हुए। पगडंडियों के किनारे फूलों के वृक्ष, हरी-भरी घाटियाँ और बर्फ से ढकी चोटियाँ अपनी छवि बिखेर रही थीं। वापस आकर हमने गर्म पानी में पैर डाले, स्नान किया और फिर जल्दी भोजन खाकर विश्राम करने चले गये। आज हमें पंद्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित हिंदुओं व सिखों के पवित्र तीर्थ स्थल, लक्ष्मण मंदिर व हेमकुण्ड साहब जाना है। यात्रा कठिन है, इसलिए पैदल न जाकर हमने घोड़ों पर जाने का फ़ैसला किया है। 


८ सितंबर २०२५ 

हमने सुबह जल्दी ही यात्रा आरम्भ कर दी थी। हेमकुंड तीर्थ स्थल में रात्रि को ठहरने की कोई सुविधा नहीं है इसलिए यात्रियों को दोपहर दो बजे वापस आना पड़ता है।मध्य में दो बार रुक कर लगभग चार घंटों की यात्रा के बाद हम गुरुद्वारे पहुँच गये। हेमकुंड की यात्रा भी एक बार वर्षों पूर्व की थी। मन में बर्फ से जमी एक झील और ब्रह्म कमल की याद सबसे मुखर थी। इस बार भी ब्रह्म कमल के दर्शन हुए, झील के किनारे कई गमलों में उसके पौधे लगाये हुए थे, उनमें से कुछ सूख गये थे, पर उसकी गरिमा में कोई कमी नहीं आयी थी।हमने गुरुद्वारे में कदम रखा तो देखा, वहाँ दीवार से सटे हुए कंबलों के ढेर रखे हैं, यात्री कंबल ओढ़कर ही बैठते हैं। हमने भी कुछ देर शबद कीर्तन सुना और प्रसाद का कूपन लेकर नीचे हॉल में आये, जहाँ चाय व खिचड़ी का लंगर बंट रहा था।वह गर्म प्रसाद ही हमारा दिन का भोजन था।निकट ही लक्ष्मण मंदिर था तथा नंदा देवी का मंदिर भी। लक्ष्मण को यहाँ लोकपाल माना जाता है। सतयुग में शेषनाग के रूप में और द्वापर में बलराम के रूप में उन्होंने यहीं तपस्या की थी। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म में यहाँ तपस्या की थी। कहा जाता है, जब महिषासुर औरंगज़ेब के रूप में जन्म लेने वाला था, तब उन्हें भारत में जन्म लेने के लिए कहा गया। इतिहास और पुराण की इन गाथाओं को सुनकर लगता है, न जाने कितनी अदृश्य सत्ताएँ इस विश्व को चला रही हैं।ऐसे में मानव व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता धर्ता मानता है। मन में अनेक मधुर स्मृतियों को लिए अगले दिन सुबह हम देहरादून के लिए रवाना हुए, मार्ग में कुछ स्थानों पर भू स्खलन के कारण कुछ देर रुकना पड़ा, पर शाम होने से पूर्व ही हम मंज़िल पर पहुँच गये। 





शनिवार, दिसंबर 20

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - २


फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

दूसरा भाग




२ सितंबर २०२५

आज सुबह हम पंछियों के कलरव से उठ गये थे। रात्रि के सन्नाटे में नदियों की कलकल भी आ रही थी। कमरे से बाहर निकल कर टहलने गये, हवा शीतल थी और बहुत महीन हल्की सी फुहार पड़ रही थी। पहाड़ों की शुद्ध हवा जैसे भीतर तक ताजगी भर रही थी।नौ बजे हम आज की पहाड़ी यात्रा के लिए रवाना हुए। ड्राइवर सुरजीत सिंह घुमावदार रास्तों पर गाड़ी दौड़ाता हुआ दस हज़ार फ़ीट पर स्थित औली ले गया। यहाँ भी ब्लू पॉपी का एक रिज़ार्ट है। वहाँ से एक गाइड हमारे साथ हो लिया। हमारा लक्ष्य था गॉर्सन बुग्याल।गॉर्सन बुग्याल अल्पाइन घास का एक खूबसूरत मैदान है, जो हरे-भरे परिदृश्यों, ओक और देवदार के जंगलों और बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों के मनमोहक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है, और यह गर्मियों में ट्रेकिंग व कैम्पिंग तथा सर्दियों में स्कीइंग के लिए एक लोकप्रिय स्थल है।बादलों के कारण हमें हिमशिखरों के दर्शन नहीं हुए, जिसके लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। नंदा देवी, माना पर्वत, दूनगिरी जैसी चोटियों का मनोरम दृश्य यहाँ से दिखायी देता है।चेयर लिफ्ट से हम काफ़ी ऊँचाई तक पहुँच गये, जहाँ से असली पैदल चढ़ाई की शुरुआत होनी थी। वर्षा के कारण रास्ता कीचड़ भरा था, मैदान में  पशुओं के आने-जाने से गोबर पड़ा था, वहाँ दलदल सी हो गई थी; किंतु हम इन सब बाधाओं के लिए तैयार होकर आये थे, रेनकोट, ऐसे जूते जिसमें पानी का असर न हो, बड़ी सी हैट आदि सामानों से लैस होकर हम पक्के पर्वतारोही के भाव में भरे हुए थे। प्रकृति का ऐसा साथ जिसमें आकाश, भूमि, हवा, जल और वृक्ष सभी भीग रहे हों, हमें आगे बढ़ने से कैसे रोक सकता था। फारेस्ट गेट तक पहुँचते-पहुँचते हरे-भरे घास के मैदान दिखने लगे, जो हिमाचल व कश्मीर के चारागाहों की याद दिला रहे थे। मार्ग में हमने कई अनोखे फूलों के दर्शन किए, उनके चित्र लिए। पहाड़ों से बहती हुई अनेक छोटी-बड़ी जल धाराएँ आ रही थीं, जिन्हें भी पार करना था। दोपहर बाद लगभग भीगे हुए हम वापस पहुँच गये। दोपहर के भोजन में अन्य पदार्थों के अलावा भरवाँ बैंगन की सब्ज़ी व मसूर की साबुत दाल विशेष बनी थी। शाम को भी वर्षा की छुटपुट रिमझिम जारी रही।



३ सितंबर २०२५ 

आज सुबह भी नींद चार बजे खुल गई। मन उदात्त भावों से भरा था, ‘हिमालय’ पर चार कविताएँ लिखीं। कल सुबह यदि समय मिला तो कुछ और सृजन कार्य हो सकता है। आज भी नाश्ते में पोहा था, जिसमें हरे मटर तथा मूँगफली पड़े थे। साढ़े नौ बजे हम स्थानीय मंदिर देखने निकले। सबसे पहले आदि शंकराचार्य ज्योतिर्मठ गये। जहाँ पुजारी श्री विष्णु प्रियानंद जी ने मंदिर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। इस मठ में चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ हैं, उनके नाम भी लिखे हैं। वे आदि शक्ति ललिताम्बा की अनुचरियाँ हैं। जिन्हें त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं, वह दस महाविद्याओं में से एक षोडशी विद्या हैं। ‘सौंदर्य लहरी’ में आदि शंकराचार्य ने उन्हीं की वंदना की है। नवरात्रि में पूजे जाने वाले देवी के नौ रूप पार्वती के नौ रूप हैं। हमने त्रिपुरा देवी के दर्शन भी किए तथा वह गुफा भी देखी, जहाँ आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी। बारह सौ वर्ष पुराने प्राचीन कल्पवृक्ष के दर्शन भी हुए। जिसके नीचे उन्होंने ज्ञान ज्योति पायी थी।यह मठ अद्वैत के चिंतन और अध्ययन को समर्पित है। उन्होंने शंकर भाष्य की रचना भी यहीं की थी। ‘त्रोटकाचार्य’ आदि शंकराचार्य के शिष्य थे, जो उनके जाने के बाद प्रथम आचार्य हुए। निकट स्थित महादेव के एक मंदिर में अखंड ज्योति जल रही थी, जहाँ सभी भक्तगण प्रसाद की जगह केवल तेल चढ़ाते हैं। इसके बाद नरसिंह भगवान के विशाल मंदिर में गये।मान्यता है कि नरसिंह भगवान ने यहाँ योग किया और शांत भाव को प्राप्त हुए। सदियों पूर्व कर्नाटक से आये डिमरी ब्राह्मण इस मंदिर के पुजारी हैं।इसके प्रांगण में हनुमान, गौरी शंकर, गणेश, देवी और सूर्य को समर्पित कई अन्य मंदिर भी हैं। पुजारी लक्ष्मी नारायण जी ने कहा, आगामी नवरात्र में वे हमारे लिए भी पूजा करेंगे। उन्होंने फ़ोन नंबर ले लिए है, मठ में होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी भी देते रहेंगे। हम वहाँ दर्शन कर ही रहे थे कि पुत्र का फ़ोन भी आ गया था, वीडियो कॉल के माध्यम से उसे भी मठ के दर्शन करा दिये।


उसके बाद निकट के बाज़ार से कुछ स्थानीय दालें तथा सब्ज़ियों के बीज ख़रीदे।दोपहर का भोजन वापस आकर किया। शाम को होटल के पीछे वाली सड़क से नीचे उतरते हुए नदी के कुछ चित्र लिए।मौसम ख़राब होने के कारण पिछले चार दिनों से बद्रीनाथ व अन्य पर्यटन स्थल जाने का मार्ग बंद है।शाम को ज्ञात हुआ, आज इसी रिज़ौर्ट में बद्रीनाथ से एक समूह लौटा है, शायद कल हम भी जा सकेंगे। 



गुरुवार, दिसंबर 18

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - १

    फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

पहला भाग


१ सितम्बर २०२५ 


हमारी यात्रा अगस्त माह के अंतिम दिवस शुरू हुई।सुबह साढ़े सात बजे हम घर से चले। आरामदायक हवाई यात्रा के बाद दोपहर बाद देहरादून पहुँच गये। दीदी-जीजा जी के यहाँ सदा की तरह शानदार स्वागत हुआ। उनकी गृह सहायिका समोसे व कलाकंद ले आयी थी। हमने कुछ देर दीदी-जीजा जी के पुराने फ़ोटो देखे। दीदी के लिखे जीवन के कई पुराने प्रसंग पढ़े। बगीचे में चहलक़दमी की और फूलों की तस्वीरें उतारीं। रात्रि भोजन में कढ़ी-चावल, लौकी की विशेष सब्ज़ी और नमकीन सेवियाँ भी थीं। रह-रह कर वर्षा की टिप-टिप आरम्भ हो जाती थी, लेकिन  रात भर वर्षा रुकी रही। सुबह पाँच बजे ही हम तैयार हो गये थे। दीदी ने नाश्ता बना कर दे दिया  था। देहरादून से ऋषिकेश होते हुए सबसे पहले हम देवप्रयाग पहुँचे, जहां सतोपंथ ग्लेशियर से निकलने वाली अलकनंदा व गोमुख से निकलने वाली भागीरथी नदी का संगम होता है। इसके बाद इनका नाम गंगा हो जाता है। इसके बाद श्रीनगर आया जो अलकनंदा के तट पर बसा गढ़वाल क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण बड़ा शहर है। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा व सुमेरु ग्लेशियर से निकलने वाली मंदाकिनी नदी का संगम होता है। पिछले दिनों रुद्रप्रयाग में बादल फटने से हुई अत्यधिक वर्षा के कारण काफ़ी नुक़सान हुआ था। जिसके कारण हमें यात्रा स्थगित करने का विचार भी आया था। अगला स्थान था कर्णप्रयाग, जो अलकनंदा व पिंडारी ग्लेशियर से आने वाली पिंडर नदी के संगम पर बसा है।नंदप्रयाग में नन्दाकिनी ग्लेशियर से आने वाली नन्दाकिनी व अलकनंदा नदी का संगम होता है। नदियों का पानी वर्षा के कारण मटमैला था, पर दूर से वेगपूर्वक आते हुए वे कभी चाँदी के समान कभी दूध की तरह श्वेत भी प्रतीत हो रही थीं। पीपलकोटि पहुँचे तो दोपहर के भोजन का समय हो गया था।नाश्ता हमने ऋषिकेश में ही कर लिया था।रास्ते में कई जगहों पर भूस्खलन के कारण मलबा पड़ा था। जिसे हटाने का कार्य भी साथ-साथ ही चल रहा था।फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा हमारे मनों में बसा एक सुंदर स्वप्न था, जो आज साकार होने जा रहा था।हमारा लक्ष्य था औली में स्थित ‘ब्लू पॉपी आवास’।वही औली, जहाँ शीतकालीन खेलों का आयोजन होता है। किंतु ड्राइवर ने बताया, किसी कारण वश ब्लू पॉपी के मैनेजर ने कार्यक्रम में थोड़ा सा बदलाव किया है, अब हमें जोशीमठ जाना है और कल औली। ग्यारह घंटे की यात्रा के बाद शाम को सवा चार बजे हम जोशीमठ पहुँचे गये।औली और जोशीमठ के बीच केवल तेरह किमी की दूरी है। 


ऋषिकेश से लगभग ढाई सौ किमी दूर तीन हज़ार साल पुराना शहर है जोशीमठ, जिसका दूसरा नाम ज्योतिर्मठ है।यह त्रिशूल पर्वत की ढाल पर अलकनंदा के किनारे बसा हुआ है। इसके दोनों ओर बद्री तथा कामत शिखर हैं। आठवीं शताब्दी में यहाँ आदि शंकराचार्य ने एक मठ की स्थापना की थी, जो उन चार मठों में से एक है, जिन्हें उन्होंने भारत की चार दिशाओं में स्थापित किया था। यह मठ बद्री भगवान का शीतकालीन निवास है। सर्दियों में आदि शंकराचार्य द्वारा ही स्थापित बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाने के बाद देवमूर्ति जोशीमठ के वासुदेव मंदिर में लायी जाती है। बद्रीनाथ से आये नंबूदरीपाद ब्राह्मण छह माह यहीं बिताते हैं।जोशीमठ से २६ किमी दूर गोविंद घाट से यात्रा का ट्रैक आरम्भ होता है जो घांघरिया तक ले जाता है।जहाँ से फूलों की घाटी व हेमकुंड जाया जा सकता है। प्राचीन ग्रंथों में जोशीमठ को कार्तिकेय पुर के नाम से भी लिखा गया है।जो कत्यूरी राजाओं के देवता हैं। यह मलारी और नीति घाटियों का प्रवेश द्वार भी है। इससे कुछ दूरी पर नंदा देवी बायोस्फ़ियर है, जो यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। 



जोशीमठ में स्थित ब्लू पॉपी रिज़ौर्ट पहुँचे तो वहाँ की सुंदरता ने हमारा मन मोह लिया। फूलों से भरे सुंदर बगीचे और हरे-भरे लॉन, कमरे की पिछली बालकनी से दिखती हिमालय की चोटियाँ और धौली व अलकनंदा नदियों का संगम स्थल ! रूई के समान बादलों के पुंज ऊपर उठे और देखते ही देखते सारे पहाड़ विलीन हो गये, केवल एक श्वेत चादर सम्मुख रह गई।पर्यटकों के लिए सभी सुविधाओं से युक्त था यह रिज़ौर्ट। हमने शाम की चाय पी और आस-पास का जायज़ा लेने निकल पड़े। 

क्रमश:

सोमवार, दिसंबर 1

शांति सरवर मन बने

शांति सरवर मन बने



शांत मन ही ध्यान है 

ईश का वरदान है, 

सिंधु की गहराइयाँ 

अनंत की उड़ान है !


आत्मा के द्वार पर 

ध्यान का हीरा जड़ें,

ईश चरणों  में रखी  

भाग्य रेखा ख़ुद पढ़ें !


 जले भीतर ज्ञान अग्नि

 शांति सरवर मन बने,

अवधान उपज प्रेम से, 

कर्म को नव दिशा दे !


लौट आये उर सदन 

ऊर्ध्वगामी गति मिले,  

टूट जायें सब हदें 

फूल अनहद के खिलें !