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सोमवार, सितंबर 7

प्रेम


प्रेम 

कुछ भी नहीं जानते हम 

जब यह जान लेते हैं, 

जो भी हो चुका 

वह पूर्व निर्धारित था 

जो होने वाला है 

वह है अभी हमारे हाथ में 

यह मान लेते हैं !

यदि दृढ़ हो जिज्ञासा 

और त्याग जीवन में आये 

तब जीवन हर 

कदम पर सिखाता !

एक धारा की तरह बहे 

तभी निर्मल और स्वच्छ रहे 

  कर्म करते हुए 

 करते जाना है फल अर्पण

और….  संभव ही कहाँ?

प्रेम के बिना समर्पण ! 


 

सोमवार, दिसंबर 1

शांति सरवर मन बने

शांति सरवर मन बने



शांत मन ही ध्यान है 

ईश का वरदान है, 

सिंधु की गहराइयाँ 

अनंत की उड़ान है !


आत्मा के द्वार पर 

ध्यान का हीरा जड़ें,

ईश चरणों  में रखी  

भाग्य रेखा ख़ुद पढ़ें !


 जले भीतर ज्ञान अग्नि

 शांति सरवर मन बने,

अवधान उपज प्रेम से, 

कर्म को नव दिशा दे !


लौट आये उर सदन 

ऊर्ध्वगामी गति मिले,  

टूट जायें सब हदें 

फूल अनहद के खिलें !  


मंगलवार, मार्च 18

भेद न उसका जाना जाता

भेद न उसका जाना जाता
लगता है ख़ुद नाच रहे हैं 
पर सब यहाँ नचाये जाते, 
भ्रम ही है  सब बोल रहे हैं 
कोई बुलवाता भीतर से !
 
शब्द निकलते अनचाहे ही
अनजाने ही भाव उमड़ते, 
 कोई और जगाने वाला
कर्म यहाँ करवाये जाते !

जब तक कोई हो न बाँसुरी 
तब तक काटा-छीला जाता, 
 जब तक शून्य नहीं हो जाता 
तब तक मनस तराशा जाता !

कर्म कहें या दैव उसे हम 
उसके हाथों की कठपुतली, 
कुछ भी नहीं नियंत्रण में है 
  चालबाज़ियाँ सभी व्यर्थ ही !

 पल में हुआ धूल धुसरित वह 
अभी गगन पर जिसे बिठाया, 
ज्ञानी-ध्यानी माना मन को
अज्ञानी सा कभी दिखाया !
 
मेधा कितना ज़ोर लगाये 
भेद न उसका जाना जाता, 
‘मैं’ को तजे बिना जीवन में 
सच का सान्निध्य नहीं  मिलता !


शुक्रवार, दिसंबर 6

यज्ञ

यज्ञ 

एक यज्ञ चलता है बाहर 

शुभ कर्म बनें अगरु व चंदन, 

एक यज्ञ चलता है भीतर 

श्वासों में हो पल-पल सुमिरन !  


अग्नि वही समिधा भी वह है 

वेदी व ‘होता’ भी वही है, 

नव प्रेरणा उमंग ह्रदय की 

उलझ-पुलझ में वही सही है ! 


बरस रहा मेघ के संग जो 

नीर वही नदिया में बहता, 

तृषा बुझाता आकुल उर की 

अखिल विश्व को ढक कर रहता !


मंगलवार, जनवरी 16

हर दिन नयी भोर उगती है

हर दिन नयी भोर उगती है


दिन भी सोया सोया गुजरा 

दु:स्वप्नों में बीती है रात, 

जाग जरा, ओ ! देख मुसाफ़िर 

प्रमाद लगाये बैठा घात !


चाह अधूरी सर्प सी लिपट

कर्मों की गठरी भी सिर पर, 

कदम थके हैं, भय अंतर में 

कैसे पहुँचेगा अपने घर !


जीवन चारों ओर खिला है 

तू कूपों का बना मंडूक, 

जो भी कदम उठे सच्चा हो 

अबकी न बाज़ी जाये चूक !


हर दिन नयी भोर उगती है 

जब भी जागो तभी सवेरा, 

जब निर्भय होकर जीना है 

क्यों अतीत ने मन को घेरा !


शुक्रवार, अगस्त 4

ख़ुद को ही

ख़ुद को ही 


कोई ओट दे देगा 

उढ़का देगा बाती 

या तेल भर देगा दीपक में 

पर जलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !

 

कोई मार्ग दिखा देगा 

लक्ष्य की पहचान दे देगा 

या पाथेय भी दे देगा 

पर चलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई और नहीं उठा सकता 

किसी के काँधे का बोझ 

न ही उतार सकता है 

क्योंकि गहन है कर्म की गति 

अदृश्य है वह भार 

स्वयं ही उतारना है 

हल्का होना है 

क्योंकि उड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई पता बता देगा घर का 

यदि भूल गया है मन 

भटकते हुए इस चक्रव्यूह  में 

उसकी याद दिला देगा 

पर मुड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


गुरुवार, जनवरी 5

हर पीड़ा मुदिता से भर दे

हर पीड़ा  मुदिता  से भर दे


मुक्त पिरोया गया माल में 

बिंध मध्य में शून्य हुआ जब,

जा पहुँचा सम्मान बढ़ाने 

देवस्थल की शोभा बन तब !


मन भी मुक्त सघन पीड़ा से 

सीखे  रीता होना खुद से, 

कृष्ण सूत्र में गुँथ जाता है 

एक हुआ फिर सारे जग से !


मुक्ति का यह मार्ग अतुलनीय  

हर पीड़ा मुदिता  से भर दे, 

ज्ञान प्रीत से, प्रीत कर्म से  

सुगम राह पर ला कर धर  दे !


कर्म अर्चना है अकर्म सम

व्यक्त ऊर्जा को होने दे, 

गंगा सी बहती जो निर्मल 

दिव्य भाव भीतर बोने दे  !


चाह मुक्ति की यह अनुपम है 

स्वयं का व जग का हित सधता, 

रिक्त हुआ उर जब भीतर से 

प्रियतम खुद ही आकर बसता  !


गुरुवार, अक्टूबर 27

प्रकट और अप्रकट

प्रकट और अप्रकट 


जगत 

बुना है 

प्रकट और अप्रकट 

  तन्तुओं से 

मन 

कुछ-कुछ ज़ाहिर होता है कर्मों से 

कुछ छिपा ही रहता है भीतर 

कितना छुपाना है 

कितना दिखाना 

शायद यह सीख लिया है 

सहज ही कुदरत से 

जड़ें छिपी रहती हैं 

भूमि में दूर तक अंधकार में 

और ऊपर फूल खिलाता है पेड़ 

मन की जड़ें भी फैली हैं 

रिश्तों, वस्तुओं, स्मृतियों में 

ना जाने कितने जन्मों की 

अनंत की छाँव में यह खेल चलता है 

यह धूप-छाँव का खेल ही जीवन है 

हर श्वास में उगता निःश्वास में ढलता है ! 


सोमवार, मार्च 29

नए कई सोपान चढ़ने हैं

नए कई सोपान चढ़ने हैं 

कल जो बीत गया 

जीवन की डाली से झर गया फूल है 

अब उसे दोबारा नहीं मिलना  है 

आज तो एक नया फूल

 नए कर्म  के रूप में 

खिलना है

याद की खुशबू समेटे वह नया कर्म 

जीवन को सुवासित करे 

नए क्षितिज हों, पंछी हर दिन नयी उड़ान भरे 

वह अस्तित्त्व इसी आस में 

बढ़ता ही चला जाता है 

कि कौन उसमें नए बीज बोये जाता है 

वाणी वरदान है उसका 

शब्दों से वही उमड़ता है 

फिर हर रात समेटकर अपनी झोली 

सहेज कर उन्हें रख देता है अपने सिरहाने 

अगले दिन उन्हीं से कुछ और गढ़ने हैं तराने 

उसका कोष कभी रिक्त नहीं होता 

जीवन चुक जाता है 

वह परम कभी नहीं चुकता !


हर दिन एक नया सवेरा लेकर आता है 

नया विश्वास, नयी आस लिए 

जाने कौन सा रहस्य खुलने वाला है 

नया खजाना मिलने वाला है 

अनगिनत कोष छिपे हैं प्रकृति के गर्भ में 

जीवन हर रोज नया होता जाता है 

जब अतीत सूखे पत्तों की तरह

झरता चला जाता है !

हर रोज एक नया  अवसर है 

नयी चुनौती भी 

हर दिन पर एक ताला लगा है 

जिसे खोलना है 

नए रंगों को जीवन में घोलना है 

नई राहों पहली बार कदम रखने हैं 

नए कई सोपान चढ़ने हैं 

नए कुछ ख्वाब बुनने हैं !


गुरुवार, जुलाई 16

माया

माया 


कभी दर्द दिया 
कभी मुस्कानें
कभी रोये औरों के दुःख पर 
फिर दिए उन्हीं को ही ताने
कभी राह दिखाई मंजिल की 
कभी मन में  संशय भर डाला
कभी रोका जिस पथ चलने से 
फिर उसका पता बता डाला ! 
रिश्तों की ऐसी माया है 
कोई पार निकल कर ही जाने 
यह निज कर्मों की खेती है 
सुख-दुःख के बोये थे दाने !


मंगलवार, जून 23

भाव और अभाव

भाव और अभाव
 
जो भी दुःख है...  अभाव से उपजा है 
जो भी इच्छा है...  उस अभाव को दूर करने की है 
जो भी कर्म है...  उस इच्छा को पूरा करने के लिए है 
समीकरण सीधा है 
अभाव का अनुभव ही कर्म में लगाता है 
 
सिर पर छत हो 
घर में दाने हों 
तन ढका हो 
तब तो गिर जायेगा अभाव ?
 
नहीं, मन एक नया अभाव उत्पन्न करेगा 
 
 सुंदर सन्तान हो 
 प्रिय का संग हो 
समाज में नाम हो 
तब तो मिट जायेगा न अभाव ?
 
नहीं, मन कुछ और अभाव जगा देगा 
 
बैंक में नामा हो 
तन भी स्वस्थ हो 
सुख का हर साधन हो 
तब ? 
 नहीं, अभाव उत्पन्न करना ही मन का स्वभाव है 
 
और जीवन के अंतिम क्षण तक 
उसे पूरा करते रहना मानव की विवशता 
जब तक वह यह जान न ले 
कि अधूरा मन नहीं वास्तव में 
वह पूर्ण है ! 
 
तब हर कर्म पूर्णता से उपजेगा 
वही होगा कृष्ण का निष्काम कर्म 
जो अभाव से नहीं भाव से होता है आयास
बाँधता नहीं बाँटता है जग में निज सुवास ! 

गुरुवार, मई 21

वह अनंत पथ खुद से जाता

वह अनंत पथ खुद से जाता 


उस अनन्त पथ के हो राही
बाधाओं से क्या घबराना, 
जन्मों की जो चाह रही है 
उसे थाम कर बढ़ते जाना !

गह्वर भी हैं सँकरे रस्ते 
भय के बादल घोर अँधेरे,
कर्मों की जंजीर पड़ी है 
अपना ही मन देगा धोखे !

किन्तु नहीं पल भर को इनकी 
व्यर्थ व्यथा में जकड़ो खुद को, 
एक उसी की लगन लगी हो
बल देंगी राहें कदमों को !   

प्रतिपल नीलगगन से आतीं 
लहरें सिंचित करतीं मन को, 
नीचे धरती माँ सी थामे 
दृष्टि टिकी हो मात्र लक्ष्य पर !

भाव जगें पल-पल शुभता के 
उनकी आभा में लिपटा तन,  
वह अनंत पथ खुद से जाता 
क्यों संशय में सिमटा है मन !

सोमवार, मई 11

स्वप्न

स्वप्न 

 स्वप्न टूटा, नींद टूटी, कर्म छूटे 
स्वप्न जारी, नींद प्यारी, कर्म बंधन 
स्वप्न में ही किले बनते और ढहते 
स्वप्न में ही लोग हँसते और रोते
भय के बादल खूब बन-बन कर बरसते 
कामनाओं के समंदर बहा करते 
डूबते जिनमें कभी भँवरों में फँसते 
पत्थरों से कभी टकरा चूर होते
कल्पनाओं में बने राजा चमकते 
स्वप्न है यह जिंदगी कब देख पाते 

स्वप्न में खो स्वयं ही नव रूप धरते  
एक होकर भी अनेकों नजर आते 
नींद गहरी यूँ लुभाती व सुलाती 
जागकर भी उन्हीं गलियों में भटकते 
कर्म हर होता तभी तक स्वप्न जब तक चल रहा है 
नींद से जागे न जब तक स्वप्न तब तक चल रहा है 




सोमवार, नवंबर 25

कल आज और कल

कल आज और कल

फ़िक्र कल की क्यों सताए
आज जब है पास अपने,
कल लगाये  बीज ही तो
पेड़ बन के खड़े पथ में !

मौसमों की मार सहते
पल रहे थे, वे बढ़ेंगे,
गूँज उनकी दे सुनायी
गीत जो कल ने  गढ़े थे !

एक अनुभव एक स्पंदन
सुगबुगाया था मनस में,
एक चाहत लिए आयी
द्वंद्व के इस  बाग बन में !

कर्म को पूजा बनाया
एक गौरव पल रहा था,
ध्यान पूजा अर्चना में
जगत सारा जल रहा था !

चेतना कब मुक्त होगी
भेद सारा छिपा इसमें,
कब तलक चलते रहेंगे
बस एक अंधी दौड़ में !



गुरुवार, जुलाई 31

वही मुक्त है शेष बो रहे



वही मुक्त है शेष बो रहे


जो उसका है उसके हित है
वही जागता शेष सो रहे,
मधुरिम सी जो कृपा बरसती
वही पा रहा शेष खो रहे !

उसका होना ही होना है
वही मुक्त है शेष बो रहे,
काटेंगे कर्मों की खेती
कोरा है वह शेष धो रहे !

जो उसके चरणों में झुकता
वही उठा है शेष ढो रहे,
बैठ गया जो वह पहुंचा है
वृष कोल्हू के शेष जो रहे !

जिसने खुद के भीतर झाँका
पाया उसने शेष तो रहे,
जुड़ा एक अजस्र स्रोत से
बस यूँ ही से शेष हो रहे !