कुछ भी नहीं जानते हम
जब यह जान लेते हैं,
जो भी हो चुका
वह पूर्व निर्धारित था
जो होने वाला है
वह है अभी हमारे हाथ में
यह मान लेते हैं !
यदि दृढ़ हो जिज्ञासा
और त्याग जीवन में आये
तब जीवन हर
कदम पर सिखाता !
एक धारा की तरह बहे
तभी निर्मल और स्वच्छ रहे
कर्म करते हुए
करते जाना है फल अर्पण
और…. संभव ही कहाँ?
प्रेम के बिना समर्पण !




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