कविता दिल की भाषा जाने
वाणी अटकी, बोल न फूटे
अंतर का चैन कोई लूटे,
कविता दिल की भाषा जाने
कितने कूल-किनारे छूटे !
रागी मन बनता अनुरागी
भीतर कैसी पीड़ा जागी,
पलकों में पुतली सा सहेजे
भीतर लपट लगन की लागी !
उर में प्रीत भरे वह करुणा
डबडब नयना करें मनुहार,
छलक-छलक जाये ज्यों जल हो
गहराई में छिपा था प्यार !
सरल, तरल बहता मन सरि सा
घन बन के जो जम ना जाये,
अंतर उठी हिलोर उलीचे
नियति लुटाना, कवि कह जाये !
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भाव मन गहरे छू जाए दिल की बात दिल ही जाने । सरलता , प्रेम और हृदय में बसी करुणा का ही विश्वास है, जो जी लाये जा रहा है । हर विपत्ति में साथ होना का भरोसा हर खुशी में साथ होने का वायदा , सुंदर कविता ।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार प्रियंका जी!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 22 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार दिग्विजय जी!
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार !
हटाएंरागी मन बनता अनुरागी
जवाब देंहटाएंजरूरत है अनुराग की
सुन्दर रचना wahhh
स्वागत व आभार !
हटाएंबहुत ही सुंदर रचना है। बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं आपको।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत ही सुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंSuch a heart warming composition! The words flow like a gentle breeze calming the mind
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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