सागर सी आत्मा
दिन-रात
सागर में लहरें उठती हैं
फेन, बुदबुदे, तरंगें
सभी तो जल हैं !
आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ
भाव, विचार, कल्पनाएँ
सभी तो ऊर्जा हैं !!
सागर अपनी गरिमा में रहता है
जल भी तत्वतः वैसा का वैसा,
आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित
ऊर्जा अपरिवर्तित ।
लहरें बाहर से नहीं आयी
सागर का ही विवर्त हैं !
आत्मा निरंजन है
मन मात्र विवर्त है !!
सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत बहुत आभार श्वेता जी!
जवाब देंहटाएंसागर एक कविता ही है ... लहरों के साथ बहता हुआ ...
जवाब देंहटाएंवाह!! स्वागत व आभार!
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