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शनिवार, दिसंबर 28

कुदरत की रीत अनोखी है

कुदरत की रीत अनोखी है

जो खाली है वह भरा हुआ
जो कुछ भी नहीं वही सब कुछ,
कुदरत की रीत अनोखी है
जो लुटा रहा वह ही पाता !  

जो नयन मुँदे वे सब देखें
उस की यह कैसी चतुराई,
थम जाता जो वह ही पहुँचा
जो हुआ मौन सब कह जाता !

जो जाने कुछ वह क्या जाने
ज्ञानी बालक सम बन जाता,
पा लेता सब कुछ खोकर भी
यह राज न जगत समझ पाता !

जो दूर बहुत वह निकट अति
जो स्वयं से प्रीत करे न थके,
पाकर जिसको मन खो जाये
 फिर कौन यह भेद कहे जाता !