दिल जाये कुर्बान....
श्रद्धा का एक बिरवा रोपा है उसने
मन की धरा पर
सच की खेती करने का बीड़ा उठाया है
जन्मों तक झूठ को आजमाने के बाद...
भ्रम, जो खा रहे थे दीमक की तरह
बुद्धि की इमारत को,
जला डाले हैं और
उखाड़ फेंकी हैं वे दीवारें तेरी-मेरी की
जो खड़ी कर लीं थी यूँ ही
किसी कमजोर क्षण में...
उस बिरवे में फल लगेगा
प्रेम का जिस दिन,
उस दिन की स्मृति में
एक वादा किया है खुद से
दिल देके किसी को लौटाना है नहीं
कभी किश्तों में प्रेम चुकाना है नहीं...
देने का किया है निश्चय तो
दे ही डालना है पूरा का पूरा खुद को
प्यार जगे जो भीतर सो न जाये कहीं
पिछली बारों की तरह
जब मंजिल करीब आकर दूर चली जाती थी...
अब बड़े जतन से सींचना है
इस बिरवे को
ताकि दिल जाये कुर्बान
यही तो है दिल की शान !