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रविवार, जून 14

दुख की तुम गाथा सुनाते

दुख की तुम गाथा सुनाते


दो दिनों के बीच में इक रात आती 

रात का तुम ज़िक्र करते 

दिन तुम्हारे पास था 

दिन कभी गाया नहीं !


दो सुखों के बीच था इक दुख पिरोया 

दुख की तुम गाथा सुनाते 

सुख तुम्हारे पास था 

सुख कभी गाया नहीं !


जो नहीं है पास उसकी राह तकते

जो मिला वह याद कब है 

ज़िंदगी ने जो दिया

वह कभी गाया नहीं !


जो करेगा जिगर रोशन होश है वह 

भूल जाओ क्या कमी है  

मुक्त होकर आज जी लो 

कल कभी आया नहीं !

 

बुधवार, जून 9

नूतन तरु के गात हो रहे

 नूतन तरु के गात हो रहे 

निर्मल गंगाजल से बहते  

तुम ही श्यामल घन बन बरसे, 

चिन्मय ! चेतनता बन रहते 

है कण-कण में गति भी तुमसे !


खो, पुनः-पुनः तुम्हें पाना है 

जैसे दिन और रात हो रहे, 

नित नवीन संबंध जुड़े ज्यों 

 नूतन तरु के गात हो रहे !


शब्दों को आशय तुम देते 

वाणी के तुम संवाहक हो, 

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं 

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


तुम बिन रहे अधूरा सा सब 

जीवन अर्थवान हो तुमसे, 

मननशील हो मानस जिनका 

मनुज वही बन पाते ऐसे !