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बुधवार, मई 6

लॉक डाउन में ढील

लॉक डाउन में ढील


ग्रीन, रेड और ऑरेंज जोंस में 
अब  बंट गए हैं लोग 
लगता है, विभाजन ही मानव की नियति है 
ग्रीन में आजादी अधिक है 
जिंदगी पूर्ववत होने का आभास दे रही है 
अति उत्साह में लोग भूल जाते हैं 
चेहरे पर मास्क लगाना 
और दो गज की दूरी बनाये रखना 
वे इस तरह बाहर निकल आये हैं 
जैसे पिंजरों से पंछी 
सब्जी-फल की दुकानों से ज्यादा 
लगी हैं लंबी-लंबी कतारें 
उन दुकानों पर, 
जहाँ मस्ती और चैन के नाम पर 
जहर बिकता है 
पर नशे का व्यसन उन्हें विवश करता है 
अथवा वे डूब जाना चाहते हैं 
जीवन की वास्तविकताओं को भुलाकर 
किसी ऐसे लोक में 
जहाँ न नौकरी जाने का गम है 
न कोरोना से ग्रस्त हो जाने का 
वे चैन की नींद सो सकेंगे चंद घण्टे शायद बेहोशी में 
काश ! कोई उन्हें बताये 
एक चैन और भी है, जो बेहोशी में नहीं 
होश में मिलता है 
जिसे पाकर ही दिल का कमल पूरी तरह खिलता है 
जहाँ टूट जाती हैं सारी सीमाएं 
मन उलझनों से पार... खुद से भी दूर लगता है 
यह अनोखा नशा ध्यान का 
ऊर्जा से भरता है 
और यह बिन मोल ही मिलता है !


गुरुवार, दिसंबर 19

आदमी





आदमी

सुलगता इक सवाल बन गया है आदमी 
चेतना ज्यों सो गयी 
शरम-हया खो गयी 
गली गली दानव हैं 
मनुष्यता रो गयी 
जूझता  इक बवाल बन गया है  आदमी 
आधी रात तक जगे 
भोर नींद में कटे 
देवों का ध्यान नहीं 
नियम वरत सब मिटे
उलझता इक ख्याल बन गया है आदमी 
हवा धुऑं धुआँ हुई 
सूरज भी छुप गया  
अपने ही हाथों से
 जहर ज्यों घोल दिया 
'नादान' इक  मिसाल बन गया है आदमी 
अपने ही देश में 
तोड़-फोड़ कर रहा 
सभ्यता की दौड़ में 
अनवरत पिछड़ रहा 
वाकई  इक जमाल बन गया है आदमी