“इक काव्य रचा जाता है
पल पल इस सृष्टि में “
जाने कहाँ से आ रही
खुशबू रुहानी सी !
तन मन डुबोए जा रही
खुशबू सुहानी सी !
मदमस्त यह आलम हुआ
खुशबू है जानी सी !
नासपुटों में भर रही
खुशबू पुरानी सी !
जाने से पहले रख गया
खुशबू निशानी सी !
रग-रग में बहे रक्त सी
खुशबू रवानी सी !
यादों के तार छेड़ गयी
खुशबू कहानी सी !
आयी नहीं जब राह तकी
खुशबू है मानी सी !
