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सोमवार, नवंबर 12

“इक काव्य रचा जाता है पल पल इस सृष्टि में “


इक काव्य रचा जाता है
पल पल इस सृष्टि में


जाने कहाँ से आ रही
खुशबू रुहानी सी !

तन मन डुबोए जा रही
खुशबू सुहानी सी !

मदमस्त यह आलम हुआ
खुशबू है जानी सी !

नासपुटों में भर रही
खुशबू पुरानी सी !

जाने से पहले रख गया
खुशबू निशानी सी !

रग-रग में बहे रक्त सी
खुशबू रवानी सी !

यादों के तार छेड़ गयी
खुशबू कहानी सी !

आयी नहीं जब राह तकी
खुशबू है मानी सी !