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गुरुवार, जनवरी 30

जीवन पग-पग पर मिलता है

जीवन पग-पग पर मिलता है 

नजर उठाकर जरा निहारें 
इंच भर ही राह संवारें,
आँचल में सुवास भर देता 
धीमे से बस उसे पुकारें !

किसी पुहुप में आ खिलता है 
जीवन पग-पग पर मिलता है !

शब्दों को नव अर्थ मिलेंगे 
चट्टानों के द्वार खुलेंगे, 
अनजाने रस्तों से आकर 
निर्मल निर्झर फूट पड़ेंगे !

नूतन पल्लव में हिलता है 
जीवन पग-पग पर मिलता है !

मुस्काने गह्वर में दबी थीं 
स्मृतियों की परतें ओढ़ी थीं,
परत दर परत खिसकती जाती 
व्यर्थ ही सीमाएं गढ़ ली थीं !

एक सूत्र घट-घट बसता है 
जीवन पग-पग पर मिलता है !

सोमवार, सितंबर 25

एक पुहुप सा खिला है कौन


एक पुहुप सा खिला है कौन 


एक निहार बूँद सी पल भर
किसने देह धरी,
एक लहर सागर में लेकर
किसका नाम चढ़ी !

बिखरी बूँद लहर डूब गयी 
पल भर दर्श दिखा,  
जैसे घने बादलों में इक
चपला दीप जला !

एक पुहुप सा खिला है कौन 
जो चुपचाप झरे,  
एक कूक कोकिल की गूँजे
इक निश्वास भरे !

एक राज जो खुला न अब तक
कितने वेद पढ़े,  
किसी अनाम की खातिर कौन
पग-पग नमन करे !


सोमवार, फ़रवरी 27

बंटना ही जीवन है



 बँटना ही जीवन है 

सूर्य बाँटता है अपनी ऊर्जा
सृष्टि के हर कण से
पुहुप  सांझा करता है
 मधु और गंध
हवा प्रवेश करती आयी है अनंत नासापुटों में
अनंत काल से !

अस्तित्त्व लुटा रहा है बेशर्त पल-पल
जितना देता है वह
 उतना ही भरता जाता है
न जाने  किस अदृश्य कोष से !

लुटाती है माँ अपने अंतर का प्रेम
पोषित होगी शिशु की आत्मा
देह भी उष्ण है मन की ऊष्मा से !

शुचिता है वहाँ जहाँ बहाव है
अटका हुआ मन ही उलझाव है
रोक ली गयी ऊर्जा ही
मन का भटकाव है
अनवरत झरती ऊर्जा ही
भक्ति का भाव है !



सोमवार, नवंबर 11

कोई

कोई

हर प्रातः सूर्य किरणों पर चढ़
पुहुपों के अंतर को छूकर
ओस कणों से ले नरमी
खग पाखों से ले गरमी
 कोई वसुंधरा पर उतरे !

हर साँझ रंग आंचल में भर
वृक्षों की फुनगी पर जाकर
रिमझिम फुहार से ले नमी
सतरंगी आभा पा थमी  
कोई नजर नयन में कांपे !

हर रात्रि चाँदनी वसन ओढ़
जुगनू की नीली छवि छूकर
संध्या तारे से ले चमक
ढलते सूरज से ले दमक
कोई दूर क्षितिज से झांके !

अंतर ऊष्मा से स्पन्दित हो
 पर दुःख से द्रवीभूत कातर
ले उच्छ्वासों से असीम वेग
 श्वासों से ऊर्जित संवेग
कोई कवि कंठ बन गाए !