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शनिवार, जनवरी 25

मज़दूर

मज़दूर 


घास काटने की मशीन का शोर 

आ रहा है अनवरत 

साथ में उस तेल की गंध 

जो मज़दूर ने मशीन में डाला होगा 

जनवरी की एक सुबह 

पर धूप इतनी तेज है 

मानो दोपहर का समय हो 

मुँह को कपड़े से ढाँपे वह दत्तचित्त होकर 

काटता जा रहा है 

घरों के आगे बने बगीचों की घास 

शायद सारा दिन उसे यही करना है आज 

घास के छोटे-छोटे तिनके 

चिपक जाते हैं उसके कपड़ों पर 

शायद अभ्यस्त हो चला होगा 

उन लाखों मज़दूरों की तरह 

जो बंद फ़ैक्टरियों में काम करते हैं 

शोर और अजीब-अजीब गंधों के बीच 

या उन खदान मज़दूरों की तरह 

जो धरती से नीचे कितनी गहराई में 

ख़तरों का सामना करते हैं 

मालिकों के लिए 

सोना, चाँदी और कोयला लाकर 

उनके ख़ज़ाने भरते हैं !


मंगलवार, जून 4

नये घर में

नये घर में


हरा-भरा विशाल बगीचा
बिछा है जिसमें कोमल घास का गलीचा
सलेटी आकाश से गिरता अमृत सा जल
भिगो रहा है कण-कण धरा का
बरामदे की छत पर घूमते पंखे की हवा में
झूमते गमलों के पात
बाहर भीगते हैं फूलों-पौधों के गात
नये घर में थी कल हमारी दूसरी रात
सामने है मेजेंटा बोगेनविलिया
बायीं ओर गुलमोहर
श्वेत पंखुड़ियों के मध्य पीली लिए
सुवासित फूलों का पेड़ दूर हेज को छूता हुआ
दायीं ओर ‘ब्लीडिंग हार्ट’ के रक्तिम आभा लिए श्वेत पुष्प
‘जीनिया’ की कतारें भी मुस्तैद खड़ी हैं
गुलाब की झाड़ी भी हँसने पर अड़ी है
पंचम सुर में आम पर कोयल है गाती
हरियाली ही हरियाली है दूर तक नजर आती
गेट पर खड़े हैं दोनों तरफ कंचन
मानो हर आगन्तुक का करते हों अभिनन्दन
सुर्ख लाल जवाकुसुम बाहर से नजर आता है
निकट खड़े दुसरे गुलमोहर को भी लजाता है
सडक पार रोज गार्डन के नजर आता है अमलतास
एक सुखद अनुभव है नये घर में निवास
शुरू हो गयी है सडकों पर वाहनों की आवाजाही
भ्रमण पथ पर नजर आ जाता है अक्सर कोई राही..

रविवार, अप्रैल 22

कुछ पल बगीचे में...


कुछ पल बगीचे में...

हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है
पेड़ों के झुरमुटों से
सुनहली धूप में चमक रहा होता है
जब घास का एक एक तिनका
किसी तितली के इंतजार में फूल
आँखें बिछाए तो नहीं
बैठा होता डाली के सिरे पर..

सूनी सड़क पर एकाएक
गुजर जाती है कोई साईकिल
और ठीक तभी दूर से
आवाज देती है गाड़ी
स्टेशन छोड़ दिया होगा किसी ट्रेन ने
हाथ हिल रहे होंगे, प्लेटफार्म और
ट्रेन के कूपों से बाहर हवा में
जाने किस किस के....  

आकाश नीला है
और श्वेत बगुलों से बादल
इधर-उधर डोल रहे हैं
एक पेड़ न जाने किस धुन में बढ़ता चला गया है
बादल की सफेद पृष्ठभूमि में
खिल रहा है उसका हरा रंग
जैस सफेद चादर पर हरे बूटे...

रह रह के हवा झूला जाती है झूला
जिस पर बैठ कर लिखी जा रही है कविता
परमात्मा इतना करीब है इस पल कि
नासिका में भर रही है उसकी खुशबू
और कानों में गूंज रही है बादलों की गड़गड़ाहट
धूप की तेजी को कम करती
रह-रह कर सहला जाती है
हवा की शीतलता
‘मैं हूँ’ यह है सौभाग्य मेरा
एक श्वेत तितली
कहती हुई गुजर जाती है सामने से..
हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है बगीचे में...