'जो' है खुशी का सबब किसी के लिए
कुछ उससे ही दुखों के वस्त्र सिले जाते हैं
जमाने में फूल भी तो खिलते हैं
महज फितरत से कांटे ही चुने जाते हैं
दी है खुदा ने पूरी आजादी
कोई जन्नत, कुछ जहन्नुम से दिल लगाते हैं
शब्द सारे उन्हीं स्वर-वर्ण से बने
कोई वंदन तो कुछ क्रंदन में पिरोते हैं
मिले हर माल कुदरती बाजार में
कोई सुकून तो कुछ झंझट लिए जाते हैं
नजर अपनी ही धुंधली है मगर
इल्जाम जमाने को दिए जाते हैं
नजर बदली तो नजारे बदलते
रंगीन चश्मे लगा श्वेत शै चुने जाते हैं
मुक्कमल आकाश छिपाए भीतर
लोग पिंजरों में जिंदगी बिताए जाते हैं
दरिया बहते समंदर ठाठें मारे
जाने क्यों प्यास दिल से लगाए जाते हैं
कौन कहता है, रब नहीं, बुद्ध ने कहा
स्वयं बंद आँखों में बसाए जाते हैं !
