परिचित जो अंतर पनघट से
जग जैसा है बस
वैसा है
हर नजर बताती
कैसा है
कोई इक बाजार
समझता
कोई खालिस प्यार
समझता
विकट किसी को
सागर जैसा
कोई धारे गागर
जैसा
जग तो अपनी राह
चल रहा
नादां मन स्वयं
को छल रहा
कोई फूलों को
चुन लेता
दूजा काँटों को
बुन लेता
ताज बनाकर सिर
पर पहने
आँसू बहा तुष्टि
भर लेता
जग में दानव
रहते आए
देव बहिष्कृत
होते आए
देवों को इक सबल
बनाता
दूजा रह विरक्त
छुप जाता
जगत किसी को
बंधन जैसा
कोई निशदिन गीत
सुनाता
वही पार उतरा इस
तट से
परिचित जो अंतर
पनघट से
जग की चिंता कौन
करे अब
जगपति की वह शरण
गहे जब
न बदला है न बदलेगा यह
बुद्ध, कबीर, नानक कहें सब

