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सोमवार, नवंबर 16

परिचित जो अंतर पनघट से

परिचित जो अंतर पनघट से

जग जैसा है बस वैसा है

हर नजर बताती कैसा है

 

कोई इक बाजार समझता

कोई खालिस प्यार समझता

विकट किसी को सागर जैसा

कोई धारे गागर जैसा

 

जग तो अपनी राह चल रहा

नादां मन स्वयं को छल रहा

 

कोई फूलों को चुन लेता

दूजा काँटों को बुन लेता

ताज बनाकर सिर पर पहने

आँसू बहा तुष्टि भर लेता

 

जग में दानव रहते आए

देव बहिष्कृत होते आए

 

देवों को इक सबल बनाता

दूजा रह विरक्त छुप जाता

जगत किसी को बंधन जैसा 

कोई निशदिन गीत सुनाता

 

वही पार उतरा इस तट से

परिचित जो अंतर पनघट से

 

जग की चिंता कौन करे अब

जगपति की वह शरण गहे जब

न बदला है न बदलेगा यह

बुद्ध, कबीर, नानक कहें सब   

सोमवार, जुलाई 13

अभय

अभय 

भयाक्रांत मन विचार नहीं करता 
वह केवल डरता है 
अस्तित्त्व के साथ एक नहीं होता 
संशय ही भीतर भरता है 
स्वप्नों के में भी डरा जाते हैं उसे पशु और दानव 
भूल ही जाता है वह कि देवों की संतान है मानव 
भय खबर देता है कि अभी आस्था अधूरी है 
अभय के लिए जागना जरूरी है 
कि अनंत से जुड़े हैं हम 
जो इस ब्रह्मांड का संचालक है 
वही हमारा भी पालक है 
भय की आँखों में झांकना होगा 
उसके पार ही वह अभय बसता है 
जो हर हाल में हँसता है 
जीवन का मोह जिसे नहीं बांधता 
उहापोह की अग्नि में मन को नहीं रांधता
अपनी ऊर्जा को नकार में नहीं खोता  वह 
सदा एक रस ही बहता है 
भय का क्या काम वहाँ 
जिस दिल में अभय रहता है ! 

शनिवार, दिसंबर 10

पा प्रकाश का परस सुकोमल


पा प्रकाश का परस सुकोमल


दानव और दैत्य दोनों ही 
मानव के अंतर में रहते,
कभी खिलाते  उपवन सुंदर 
मरुथल में वे ही भटकाते !

गहरी खाई ऊँचे पर्वत
धूल भरे कंटक पथ मिलते,
समतल सीधी राह कभी बन 
फूलों से पथ पर बिछ जाते !

एक बिना न दूजा रहता 
द्वंद्व यही सुख-दुःख जीवन का,
पलक झपकते ही सपनों में 
दैत्य कभी देव बन जाता !

अंधियारी रातों में पलकर 
अंकुर फूटे, खुशबू बनती,
पा प्रकाश का परस सुकोमल 
कली कोई कुसुम बन खिलती !

पीड़ा मन की ही दे जाती 
खुशियों का इक महा समुन्दर,
कृष्ण बांसुरी की धुन बनते 
जब विषाद में घिरे धुरन्धर !