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गुरुवार, सितंबर 10

हर पल में इक द्वार खुल रहा

 हर पल में इक द्वार खुल रहा 

भूल गया जग गहन नींद में 

फिर भी खुद का भान हो रहा,

शब्दों ने घेरा स्वप्नों में  

मनस वहाँ ब्रह्मांड हो रहा !


कभी डराते, चेताते भी 

दु;स्वप्न जगाते भ्रम जाल से,  

किन्तु जागकर अक्सर ही मन 

डूबा रहे खामख्याल में !


हर पल में इक द्वार खुल रहा 

उस अनंत की झलक  दिखाए, 

किन्तु सांत का छोटा सा कण 

नजरों  से ओझल कर जाये !


इक दिन सब कुछ अच्छा होगा 

उस दिन की आस ही व्यर्थ है, 

नए-नए हम बीज बो रहे 

क्या जीवन का यही अर्थ है ! 


एक बार यदि रुककर कोई 

क्षण में सहज प्रवेश करेगा,

कालातीत असीम सत्य का  

निश्चय ही सन्देश सुनेगा !