हर पल में इक द्वार खुल रहा
भूल गया जग गहन नींद में
फिर भी खुद का भान हो रहा,
शब्दों ने घेरा स्वप्नों में
मनस वहाँ ब्रह्मांड हो रहा !
कभी डराते, चेताते भी
दु;स्वप्न जगाते भ्रम जाल से,
किन्तु जागकर अक्सर ही मन
डूबा रहे खामख्याल में !
हर पल में इक द्वार खुल रहा
उस अनंत की झलक दिखाए,
किन्तु सांत का छोटा सा कण
नजरों से ओझल कर जाये !
इक दिन सब कुछ अच्छा होगा
उस दिन की आस ही व्यर्थ है,
नए-नए हम बीज बो रहे
क्या जीवन का यही अर्थ है !
एक बार यदि रुककर कोई
क्षण में सहज प्रवेश करेगा,
कालातीत असीम सत्य का
निश्चय ही सन्देश सुनेगा !
