मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर
कहाँ गए ? थे हवामहल ही
कहाँ गया वह लक्ष्य साधता,
मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर
पूछा करता था जो रस्ता !
नहीं मिला जब खोजा मन ने
मेधा ने भी जोर लगाया,
थके हार जब बैठे दोनों
खुद को मंजिल पर ही पाया !
नहीं घटा कुछ जहाँ कभी भी
ऐसा एक शून्य पलता है,
जहाँ उगा है निशदिन राका
सूरज कभी नहीं ढलता है !
यह भी बस कहने में आता
इक छोड़ नहीं दूजा कोई,
एक अनोखी भोर हुई है
अंतर जिसकी सुरति समोई !
जहाँ न इक स्पंदन भी घटता
उसी में सृष्टि बनी, बिगड़ती,
जहाँ कभी कुछ हुआ न होगा
माया कैसे रूपक गढ़ती !
उस अनाम से फलित सदा हो
स्वयं का ही दर्शन स्वयं को,
एक याद युग-युग से विस्मृत
पुन: आ गई मिटा संशय को !



