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रविवार, जनवरी 10

मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर

मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर 
कहाँ गए ?  थे हवामहल ही 
कहाँ गया वह लक्ष्य साधता, 
मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर 
पूछा करता था जो रस्ता ! 

नहीं मिला जब खोजा मन ने 
मेधा ने भी जोर लगाया, 
थके हार जब बैठे दोनों 
खुद को मंजिल पर ही पाया ! 

नहीं घटा कुछ जहाँ कभी भी 
ऐसा एक शून्य पलता है, 
जहाँ उगा है निशदिन राका 
सूरज कभी नहीं ढलता है !

यह भी बस कहने में आता 
इक छोड़ नहीं दूजा कोई, 
एक अनोखी भोर हुई है 
अंतर जिसकी सुरति समोई !

जहाँ न इक स्पंदन भी घटता 
उसी में सृष्टि बनी, बिगड़ती, 
जहाँ कभी कुछ हुआ न होगा 
माया कैसे रूपक  गढ़ती !

उस अनाम से फलित सदा हो   
स्वयं का ही दर्शन स्वयं को, 
एक याद युग-युग से विस्मृत  
पुन: आ गई मिटा संशय को !
 

शनिवार, मई 19

जीवन सरिता बहती जाती




जीवन सरिता बहती जाती


सुख-दुःख मनहर तटों के मध्य
जीवन सरिता बहती जाती,
नित्य नवीन रूप धरकर फिर
माया के नित खेल रचाती !

बैठ नाव में चला मुसाफिर
डोला करता सँग लहरों के,
चल इस पार से उस पार तक
जाने मंजिल कौन दिशा में !

उठें बवंडर भावनाओं के
कभी विचारों के तूफान,
धूमिल हो जाती निगाह फिर
 नहीं नजर आता आसमान !

माया के कहीं सर्प तैरते
ग्राह बना अबोध पकड़ता,
तृष्णा बन शैवाल घेरती
कभी द्रोह का पाश जकड़ता !

जब तक दस्यु नजर नहीं आते
रमणीक लगता यह बहाव,
जरा-रोग का बंधन बँधते
दुर्दम्य लगने लगे प्रवाह !

तट पर बैठा देख रहा जो
प्रतिपल इन लहरों की क्रीड़ा,
रह अलिप्त वह ज्योति बना फिर
मुक्त रहे हो सुख या पीड़ा ! 


शुक्रवार, दिसंबर 19

मन को जरा पतंगा कर ले

मन को जरा पतंगा कर ले

तू ही मार्ग, मुसाफिर भी तू
तू ही पथ के कंटक बनता,
तू ही लक्ष्य यात्रा का है
फिर क्यों खुद का रोके रस्ता !

मस्ती की नदिया बन जा मिल
तू आनंद प्रेम का सागर,
कौन से सुख की आस लगाये
तकता दिल की खाली गागर !

सूर्य उगा है नीले नभ में
खिडकी खोल उजाला भर ले,
दीप जल रहा तेरे भीतर
मन को जरा पतंगा कर ले !

मन की धारा सूख गयी है
कितने मरुथल, बीहड़ वन भी,
राधा बन के उसे मोड़ ले
खिल-खिल जायेंगे उपवन भी !

एक पुकार मिलन की जागे
खुद से मिलकर जग को पाले,
सहज गूंजता कण कण में जो
उस पावन मुखड़े  को गाले !


सोमवार, मई 7

रुकने से इंकार जो करे



रुकने से इंकार जो करे

जीवन की टेढ़ी राहों पर
अविरत रथ यूँ बढ़ता जाता,
रुकने से इंकार जो करे
 एक कारवां बनता जाता !

एक मुसाफिर सबके भीतर
एक तलाश सदा जारी है,
नई मंजिलें पा लेने की
एक ललक मन पर तारी है !

चलते नभ पर चाँद सितारे
घूमा करती निशदिन कुदरत,  
गतिमय नीर, अनल, अनिल भी
चलना ही श्वासों की फितरत !

दिव्य लोक का स्वप्न जगाएं
बाधाएं कितनी हों पथ पर,
चले यात्रा अंतर्मन की
सुस्ताएँ पल भर ही थक कर !

सत् की ओर चलें असत् से
अंधकार से जगे उजाला,
जीवन जब उत्सव बन महके  
लगे मृत्यु का रूप निराला !