रुकने से इंकार जो करे
जीवन की टेढ़ी राहों पर
अविरत रथ यूँ बढ़ता जाता,
रुकने से इंकार जो करे
एक कारवां बनता जाता !
एक मुसाफिर सबके भीतर
एक तलाश सदा जारी है,
नई मंजिलें पा लेने की
एक ललक मन पर तारी है !
चलते नभ पर चाँद सितारे
घूमा करती निशदिन कुदरत,
गतिमय नीर, अनल, अनिल भी
चलना ही श्वासों की फितरत !
दिव्य लोक का स्वप्न जगाएं
बाधाएं कितनी हों पथ पर,
चले यात्रा अंतर्मन की
सुस्ताएँ पल भर ही थक कर !
सत् की ओर चलें असत् से
अंधकार से जगे उजाला,
जीवन जब उत्सव बन महके
लगे मृत्यु का रूप निराला !