मंगलवार, सितंबर 22
शुक्रवार, अक्टूबर 4
नारी भारत की
नवरात्रि के पावन अवसर पर नारी शक्ति को समर्पित
नारी भारत की
आँखों में निज ऊर्जा की पहचान लिए
आगे बढ़ते जाने का अरमान लिए,
अधरों पर नवल विजय की मुस्कान लिए
नारी भारत की आशा की ख़ान लिए !
रोक सके ना कोई बाधा अब इसको
वह सबला है जग कहता अबला जिसको,
नहीं चाहिए अब गहनों का कारावास
उसे चाहिए खुली धरा खुला आकाश !
न सुंदर वस्त्र न ही लुभाते राजमहल
उतर पड़ी है करने हर कठिनाई हल,
वह ख़ुद की ताक़त को पहचान चुकी है
इस दुनिया की लघुता को जान चुकी है !
जो अब तक बस नीर बहाती है आयी
बेवजह अपनी अस्मिता गँवाती आयी,
जिसने सपनों को सदा बिलखते देखा
वह अब उनको साकार बनाने आयी !
नहीं रुकेंगे इन कदमों को बढ़ने दो
जग महकेगा, हाथों से संवरने दो,
उसे मान दो, उसे चाह सिर्फ़ स्नेह की
हक़ है उसका समानता का अधिकार दो !
बुधवार, दिसंबर 6
क्यों दिल की साँकल उढ़का ली
क्यों दिल की साँकल उढ़का ली
भरें न कल्पना की उड़ानें
कैसे नये क्षितिज पायेंगे ?
नियत सोच में सिमटे रहकर
बस पुरातन दोहरायेंगे !
जहाँ अनंत कपाट खुले हों
कैसे कोई घर में बैठे,
महासमंदर ठाँठे मारे
क्यों न मुसाफ़िर गहरे पैठे !
पलकों में सपने तिरतें हों
अंतर भरे उमंग उल्लास,
अधरों पर हों गीत मिलन के
जागा रहे पल-पल विश्वास !
दूरी नहीं जरा भी उससे
जिसका पथ ये कदम ढूँढते,
अहर्निशम् दीपक जलता है
नयन मुँदे हों या हों जगते !
कोकिल और पपीहा प्यासे
अब भी लगन जगे अंतर में,
चातक तकता नील गगन को
अब भी मोर नाचते वन में !
जीवन दे उपहार अनोखे
अपनी ही झोली क्यों ख़ाली,
सब दे कर भी कभी न चुकता
क्यों दिल की साँकल उढ़का ली !
शुक्रवार, जनवरी 8
सपनों से जब पार गया मन
सपनों से जब पार गया मन
सुंदर सपने, कोमल आशा
पढ़ी प्रेम की यह परिभाषा,
सपनों से जब पार गया मन
संग निराशा छूटी आशा !
उसी प्रेम में उठना सीखा
जिसमें लोग गिरा करते हैं,
शब्दों का अब भेद खुल गया
मतभेद, मनभेद भरते हैं !
मौन समझ लें इकदूजे का
जब हम ऐसी जगह आ गये,
सहज शांति, आत्मीयता के
सान्निध्य में मन गुल खिल गए !
अब न कहीं जाना, कुछ पाना
दो ना एक हुए रहते हैं,
एक बोलना यदि चाहे तो
कर्ण दूसरे के सुनते हैं !
सोमवार, दिसंबर 28
अबूझ है मन
अबूझ है मन
कभी सपने दिखाता है मनमोहक
कि आँखें ही चौंधियाँ जाएँ
और कभी आश्वस्त करता है
पहुँचा ही देगा मंजिल पर
मन की मानें तो मुश्किल
मनवाएँ उससे यह उससे भी बड़ी
बुद्धि भी है थक-हार कर खड़ी
नींद में दुनिया की सैर कराता है
जागने पर माया के फेर में पड़वाता है
मासूम सा बना भजन भी गाता है
कभी पुरानी गलियों में लौटा ले जाता है
यह पिंजरे का पंछी
उड़ना ही भूल गया
इक आस की सींक पर बैठे-बैठे झूल गया
इसको तो बस देखते भर रहना है
न भागना इससे, न डराना
निरपेक्ष होना है
यह मन भी उसी की माया है
जिसने यहाँ सभी को जाया है !
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