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शुक्रवार, मार्च 6

चाह-अचाह


चाह-अचाह

हर चाह रिझाती है पहले 
फिर वही भगाती है 
मन-सागर में लहरों की 
एक पंक्ति जगाती है 
मन के सूने पनघट पर ही 
उसके आने की सम्भावना है 
भीड़ में मिलन असंभव है 
जब तक अटका है एक तार भी चाहत का 
उसकी बांसुरी की धुन अनसुनी रह जाती है 
जो बज रही है अहर्निश 
उसकी याद में बहाया हर अश्रु 
पोंछ डालता है मन के रस्तों पर 
पड़ी धूल के कणों को 
जो हर चाह लिए आती है अपने संग 
अनन्त प्रतीक्षा करने का साहस है जिसमें 
भीतर लौट गयी मन की उस धारा(राधा)को ही 
कृष्ण मिला करते हैं 
कान जब कुछ और सुनना न चाहें 
पलकें मुंद जाएँ निहार  अपना ही रूप 
रिक्त हुआ ठहर जाये 
ऐसे ही किसी क्षण में 
उसकी झलक आये ! 

शनिवार, जुलाई 19

अभी तो जिंदा हैं हम


अभी तो जिंदा हैं हम


दूर खड़ी है अभी तो मौत 
जब आएगी तब आयेगी
अभी तो जी लेने दो
लोग मरते हैं उन्हें मरने दो
अभी तो जिंदा हैं हम
अभी से क्यों करें उसका गम
अभी होश में आने को मत कहो
अभी तो देखने दो सपने
अभी तो झटक डालो यह बात भी
अभी तो दिन है न कहो
कभी आएगी रात भी
 ये जलती हुई चिताएं औरों की हैं
ये धूल में दबी देह अपनी तो नहीं
जो राख हो गये वे दूसरे हैं
 अभी तो खेलने खाने के दिन हमारे हैं....

शुक्रवार, मई 17

मृत्यु एक पड़ाव भर है


मृत्यु एक पड़ाव भर है

जन्म के पीछे छिपी है मृत्यु
ज्ञानी तत्क्षण देख रहा है,
नई यात्रा पर जाना है  
मृत्यु एक पड़ाव भर है !

जग यह इक दिन खो जायेगा
धूल में मिल जायेगा सब धन,   
अंधकार में छिपा उजाला
छिपा जरा में है नव यौवन !  

होती जब धौंकनी खाली
शक्ति से फिर भर जाती,
सांसे जब बाहर जाती हैं  
तब ही तो भीतर आतीं !  

हर श्वास पर मरता मानव
हर श्वास जीवन दे देती,
जीकर मरना, मरकर जीना
दो पैरों पर होती है गति !

यहाँ जिंदगी पल-पल देती
खालीपन भी भर जायेगा,
भरा हुआ पर जो पहले से
कैसे वह कुछ भी पायेगा !

हर क्षण जग खिलता-मिटता है
प्रेम में नफरत का पुट होता,
द्वन्द्वों से ही सृष्टि चलन है
सुख मोती दुःख तार पिरोता !