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गुरुवार, फ़रवरी 8

शून्य और पूर्ण



शून्य और पूर्ण


 तज देता है पात शिशिर में पेड़
ठूंठ सा खड़ा होने की ताकत रखता है
 अर्पित करे निज आहुति
सृष्टि महायज्ञ में
नुकीली चुभन शीत की सहता है
भर जाता कोमल कोंपलों औ’ नव पल्लवों से
 बसंत में वही खिल उठता है
त्याग देता घरबार सन्यासी
स्वागत करने को हर द्वार आतुर होता है
पतझड़ के बाद ही आता है बसंत
समर्पण के बाद ही मिलता है अनंत
शून्य हो सका जो वह पूर्ण बनता है
हीरा ही वर्षों माटी में सनता है !


गुरुवार, नवंबर 26

झर सकता है वही निरंतर

 झर सकता है वही निरंतर

यह कैसी खलिश..यह हलचल सी क्यों है
जो लौटा घर.. उर चंचल सा क्यों है

बादल ज्यों बोझिल हो जल से
पुष्प हुआ नत निज सौरभ से,
बंटने को दोनों आतुर हैं
ऐसी ही नजरें कातर हैं !

प्रेम सुधा का नीर बहाएँ  
सुरभि सुवासित बन कर जाएँ,
कृत्य किसी की पीड़ा हर लें  
वही तृप्त अंतर कर जाएँ !

चलते-चलते कदम थमे थे
पल भर ही पाया विश्राम,
पंख लगे पुनः पैरों में
यह चलना कितना अभिराम !

भर ही डाली झोली उसने
इतना भार सम्भालें कैसे,
रिक्त लुटाकर ही करना है
पुष्प और बदली के जैसे !

दे ही डालें सब कुछ अपना
फिर भी पूर्ण रहेगा अंतर,
शून्य हुआ जो अपने भीतर
झर सकता है वही निरंतर !

कैसी अद्भुत बेला आई
भीतर नयी कसक जागी है,
शीतल अग्नि कोमल पाहन
जैसे बिन ममता रागी है ! 

सोमवार, मई 14

पले वहाँ विश्वास का मोती


पले वहाँ विश्वास का मोती


संभल संभल के चलने वाला
गिरने से तो बच जायेगा,
गिरकर भी जो संभल गया
उसका गौरव न पायेगा !

पूर्ण बने कोई इस जग में
इसकी नहीं जरूरत उसको,
हृदय ग्राही, निष्ठावान हो
मंजिल की चाहत हो जिसको !

दोराहे हर मोड़ मिलेंगे
मुँह बाएं है खड़ी चुनौती,
हंसकर झेले तब जो उसको
पले वहाँ विश्वास का मोती !

नहीं परीक्षा लेता रब भी
जिसके कदमों में न बल है,
ठोंक-पीट कर उसको देखे
जिसमें बढ़ने का सम्बल है !

जिसको ऊपर ही जाना है
मुड़-मुड़ कर न पीछे देखे,
इस उलझन में गिर सकता वह
जिसकी राह में सुंदर लेखे !