शनिवार, दिसंबर 3

लघु जो भी है झर जायेगा

लघु जो भी है झर जायेगा


शाम हुई पुष्प झर जाता  
पात पुराना मुरझा जाता,
निज झोली में बाँधें गाँठें 
मन अतीत के नगमे गाता   !

परम सदा ही खिला-खिला है
वर्तमान में मिला-मिला है,
अच्युत है वह अटल अभी
मन काहे फिर हिला हिला है !

दृष्टि जब ऊपर उठती हो
 लघु जो भी है झर जायेगा,
आहिस्ता से कदम बढ़ा तो  
 लक्ष्य स्वयं सम्मुख आएगा !


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