मंगलवार, सितंबर 1

श्वास की धारा

 श्वास की धारा 

लक्ष्यहीन जीवन से 

श्वासें प्रश्न पूछतीं लगतीं !

क्या व्यर्थ रहेगा जीवन में 

आना-जाना उनका ?

श्वासों की गहराई में 

जो अनुपम शक्ति छिपी है, 

क्यों नहीं रच डालें 

सुखमय सुंदर कोई तराना !

मानव होकर जन्म लिया 

उसकी गरिमा पहचानें,  

वाणी, बुद्धि, विवेक मिले 

उनकी भी महिमा जानें ! 

क्षणभंगुर यह जीवन का जो

 मनहर कुसुम खिला है, 

शुभ कर्मों से मधुर सुवास 

जग में बंटती जाये ! 

कोना कोई निज भावों से

 इस जग का महका दें,  

लक्ष्य बना करें समर्पित 

उन चरणों पर हृदय कमल !

किन्तु बहे ना व्यर्थ  

मिली प्रसाद में जो यह धारा, 

नहीं बना दे अनजाने ही 

निज मन इसको कारा !


8 टिप्‍पणियां:

  1. सच जीवन यूँ ही व्यर्थ गंवाना मुनासिब नहीं
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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