सोमवार, सितंबर 21

नीला अम्बर सदा वहीं था

 नीला अम्बर सदा वहीं था

संशय, भ्रम, भय, दुःख के बादल  

जग को हमने जैसा देखा, 

छिपा लिया था दृष्टि पथ ही 

मन पर पड़ी हुई थी रेखा !


कैसे दिखे विमल नभ अम्बर

आशाओं की ओट पड़ी हो,

कैसे कल-कल निर्मल सरिता 

भेदभाव की भीत गड़ी हो !


दुराग्रहों के मोटे पर्दे 

नयनों को करते हों धूमिल,

नीला अम्बर सदा वहीं था 

जहां छँटे ये काले बादल !


स्रोत खुले जो बंद पड़े थे 

जहाँ गिरी मन से हर बाधा,

बहते हुए प्रीत के दरिया

श्यामल जीवन में थी राधा !


अपनेपन की फसल उगी थी   

दृष्टि मिली यह राज बहा झर, 

जाना, आकर जाने कितने 

बन्द पड़े हैं मन के भीतर !


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