मंगलवार, सितंबर 8

शब्दों के वह पार मिलेगा

 शब्दों के वह पार मिलेगा 

जब  खिलेगा भीतर मौन का पुष्प 

वहाँ न भावनाओं की डालियाँ होंगी 

न विचारों की भूमि !!

 

शब्दों की नाव तो बनानी ही होगी 

जो उतार देगी शून्य के तट पर !

 

शब्द ले जाते हैं खुद से दूर 

शब्द जगत हैं 

माया हैं !

 

सत्य की यदि चाह है 

तो उस आग से गुजरना होगा 

जहाँ जल जाता है सारा ज्ञान

उस सागर को पार करना होगा 

जहाँ दिखाई ही नहीं देता दूसरा तट

सूख जाता है हर सागर 

मौन के उतरते ही

बवंडर से गुजर भावों और विचारों के

उस शांति को करना होगा महसूस

जो मिटा देती है सबकुछ

पर जिसके बाद जन्म होता है 

एक नवीन सृष्टि का ! 


17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-09-2020) को   "दास्तान ए लेखनी "   (चर्चा अंक-3819) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  2. शब्दों का अपरम्पार अम्बार है
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस अंबार से पार भी तो जाना है, स्वागत व आभार !

      हटाएं
  3. शब्द ले जाते हैं खुद से दूर
    शब्द जगत हैं
    माया हैं !',,,,,,,।बहुत सुंदर शब्द ही है जो हमें दूसरों से बांधते और अलग करते हैं आदरणीया शुभकामनाएँ ।

    जवाब देंहटाएं
  4. उत्तर
    1. शब्दों से आगे या शब्दों से पहले ... भी

      हटाएं
  5. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 09 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  6. आदरणीया अनिता जी, नमस्ते👏! बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति! ये पांक्तियाँ:
    जब खिलेगा भीतर मौन का पुष्प
    वहाँ न भावनाओं की डालियाँ होंगी
    न विचारों की भूमि !!
    शब्दों की नाव तो बनानी ही होगी
    जो उतार देगी शून्य के तट पर !
    हार्दिक साधुवाद!
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    सादर!--ब्रजेन्द्रनाथ

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