बुधवार, सितंबर 30

दोनों के ही पार मिले वह

दोनों के ही पार मिले वह 


देखे राग-रंग दुनिया के 

मृग मरीचिका ही सब निकले, 

 निकट जरा जा  छूकर देखा 

जैसे इंद्रधनुष हो नभ में !


पीड़ाओं के बीज गिराए 

अनजाने या कभी जानकर, 

जिस पथ की मंजिल धूमिल है 

थके नहीं पग उसे नापकर !


हर मुस्कान छिपाए है कुछ 

भीतर कुछ है बाहर है कुछ,

दोनों के ही पार मिले वह 

कर देता हर सुख-दुख ना कुछ !  


 मिलना होगा महाकाल से 

केवल  बात यही है निश्चित,

शेष सभी स्वप्नों सा मिथ्या 

जग में जो भी मिलता सीमित  !

 

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 30 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01.10.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  3. इंद्रधनुषी छटा बिखेर दिया है । उससे तीसरे की झलक दिखलाने के लिए हार्दिक आभार ।

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  4. देखे राग-रंग दुनिया के
    मृग मरीचिका ही सब निकले,
    निकट जरा जा छूकर देखा
    जैसे इंद्रधनुष हो नभ में !

    आपकी रचनाओं में दार्शनिकता का तत्व मन को छू जाता है। बहुत सुंदर रचना !!!

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  5. मिलना होगा महाकाल से

    केवल बात यही है निश्चित,

    शेष सभी स्वप्नों सा मिथ्या

    जग में जो भी मिलता सीमित !
    बस यही तो यथार्थ है सब जानते है फिर भी पता नहीं किस भ्रम में जीते है,सुंदर सृजन ,सादर नमन आपको

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