सोमवार, नवंबर 23

आदमी

आदमी



 कली क्या करती है फूल बनने के लिए

विशालकाय हाथी ने क्या किया

निज आकार हेतु

व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए

वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास

आदमी क्यों बौना हुआ है

शांति का झण्डा उठाए

युद्ध की रणभेरी बजाता है

न्याय पर आसीन हुआ

अन्याय को पोषित करता है

अन्न से भरे हैं भंडार चूहों के लिए

भूखों को मरने देता है

पूरब पश्चिम और पश्चिम पूरब की तरफ भागता है

शब्दों का मरहम बन सकता था

 उन्हें हथियार बनाता है

एक मन को अपने ही

 दूसरे मन से लड़वाता है

लहूलुहान होता फिर भी देख नहीं पाता है

यह अनंत साम्राज्य जिसका है

वह बिना कुछ किए ही कैसे विराट हुआ जाता है !

15 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा मंगलवार ( 24-11-2020) को "विश्वास, प्रेम, साहस हैं जीवन के साथी मेरे ।" (चर्चा अंक- 3895) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. एक मन को अपने ही

    दूसरे मन से लड़वाता है

    लहूलुहान होता फिर भी देख नहीं पाता है

    यह अनंत साम्राज्य जिसका है

    वह बिना कुछ किए ही कैसे विराट हुआ जाता है !
    बहुत सही अनीता दी..।यथार्थपरक रचना..।

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    1. कविता के मर्म को समझकर त्वरित प्रतिक्रिया हेतु आभार !

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  3. आदमी क्यों बौना हुआ है---- बिलकुल सच लिखा है आपने | बहुत सुन्दर |

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 25 नवंबर 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. सत्य कहा ... आदमी आँख होकर भी अंधा है तब तो विराट अस्तित्व दिखाई नहीं देता है ।

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  7. शब्दों का मरहम बन सकता था

    उन्हें हथियार बनाता है

    एक मन को अपने ही

    दूसरे मन से लड़वाता है.....सही चित्रण, सुन्दर विचारणीय रचना!

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  8. न्याय पर आसीन हुआ

    अन्याय को पोषित करता है

    अन्न से भरे हैं भंडार चूहों के लिए

    भूखों को मरने देता है

    वास्तविकता

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