सोमवार, नवंबर 2

एक अगोचर वह अनदेखा

एक अगोचर वह अनदेखा

भरा-भरा घर किन्तु हृदय में

इक खालीपन सदा सताता,

सुना है कि कोई बिरला ही

भरे रिक्तता को मुस्काता !

 

अमल अनोखा एकांत यहाँ

जगत यह जिसको भर न पाए,

अजर, अगोचर वह अनदेखा

गीत न जब तक खुद गुंजाये ! 


जगत दे रहा जो दे सकता

अल्प मान और सम्मान भी,

अपनों की छाया भी मिलती

प्रश्नों का कुछ समाधान भी !

 

फिर भी कोई कमी अजानी

दिवस-रात साले जो मन को,

किसकी तृषा करे उर घायल 

किसका सपन पालती है वो !

 

उसके सिवा न कोई जाने

जीवन जिसने दिया मनोहर, 

अंतर को विश्राम मिलेगा

मिलन पूर्णता से हो जिस क्षण ! 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 03 नवंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (04-11-2020) को   "चाँद ! तुम सो रहे हो ? "  (चर्चा अंक- 3875)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    सुहागिनों के पर्व करवाचौथ की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  3. आदरणीया अनिता जी, आपकी इस भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक साधुवाद! ये पंक्तियाँ बहुत सुंदर हैं:
    फिर भी कोई कमी अजानी
    दिवस-रात साले जो मन को,
    किसकी तृषा करे उर घायल
    किसका सपन पालती है वो !
    --ब्रजेन्द्रनाथ

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