सोमवार, जनवरी 31

श्रद्धा का फूल



श्रद्धा का फूल 


श्रद्धा का फूल 

जिस अंतर में खिलता है 

प्रेम सुरभि से 

वही तो भरता है !


बोध का दिया जलता 

अविचल, अविकंप वहाँ 

समर्पण की आँच में 

अहंकार ग़लता है !


श्रद्धा का रत्न ही 

पाने के काबिल है 

स्वप्न से इस जगत में 

और क्या हासिल है 

आनंद की बरखा में 

भीगता कण-कण उर का 

सारी कायनात 

इस उत्सव में शामिल है !


हरेक ऊहापोह से

 श्रद्धा बचाती है 

चैन की एक छाया 

जैसे बिछ जाती है 

जो नहीं करे आकलन

 नहीं व्यर्थ रोकटोक 

श्रद्धा उस प्रियतम से

जाकर मिलाती है !


श्रद्धा का दीप जले 

अंतर उजियारा है  

हर घड़ी साथ दे 

यह ऐसा सहारा है 

अकथनीय, अनिवर्चनीय 

जीवन की पुस्तक को

 इसने निखारा है !


22 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. हरेक ऊहापोह से श्रद्धा बचाती है....
    सचमुच, श्रद्धा और विश्वास के दीप हर अँधेरे को उजाले से भर देते हैं। पावन भावनाओं से सजा सुंदर गीत।

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  3. मन में श्रद्धा का भाव प्रेम को अग्रसर करता है और नव दीप जलाने को परिर करता है ...
    सुन्दर रचना ...

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  4. तभी तो गोस्वामीजी ने मानस में कहा है, "भवानी शंकरौ बंदे श्रद्धा विश्वास रुपिनौ......।"

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  5. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (02-02-2022) को चर्चा मंच       "बढ़ा धरा का ताप"   (चर्चा अंक-4329)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    

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  6. श्रद्धा का जलता हुआ दीप नए कल की सर्जना करता है।

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    उत्तर
    1. वाह! कितना सही कहा है आपने, स्वागत व आभार!

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  7. श्रद्धा का दीप वाह!बहुत ही सुंदर सृजन।
    सादर

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  8. श्रद्धा का रत्न ही

    पाने के काबिल है

    स्वप्न से इस जगत में

    और क्या हासिल है

    आनंद की बरखा में

    भीगता कण-कण उर का

    सारी कायनात

    इस उत्सव में शामिल है !..बहुत सुंदर भाव हैं आपकी इस रचना के ।

    जवाब देंहटाएं
  9. अनिता सुधी जी, अनीता जी, मनीषा जी व जिज्ञासा जी आप सभी का हृदय से स्वागत व आभार!

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  10. श्रद्धा का दीप जले
    अंतर उजियारा है
    हर घड़ी साथ दे
    यह ऐसा सहारा है
    अति उत्तम भावाभिव्यक्ति ।

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  11. निर्विचारिता में स्वयं को सौंप देना ही तो परम श्रद्धा है... गूंगे की गुड़ भांति ....

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    1. अद्भुत !! कितनी सटीक परिभाषा दी है आपने

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  12. आपकी हर सूक्ष्मातिसूक्ष्म तरंगों को आत्मसात करना तो करना होता है किन्तु हृदय का आभार शब्दायित नहीं हो पाता है। आभार आपका।

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    उत्तर
    1. जब आत्मसात होता है तो दो कहाँ रहे जो एक दूसरे का आभार माने, वहाँ तो केवल मौन हुआ जा सकता है

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