मंगलवार, जनवरी 18

यह पल

यह पल 


माना अनंत युग पीछे हैं 

और इतने ही आगे हमारे 

किंतु यह क्षण 

न कभी हुआ न होगा दोबारा 

हर दिन नया है 

हर घड़ी पहली बार भायी है 

चक्र घूम चुका हो चाहे कितनी बार 

पर हर बार बरसात 

किसी और ढंग से आयी है 

स्मृतियों का बोझ न रहे सिर पर 

न भावी का कोई डर 

इस पल में ही जी लें और मरना पड़े तो जाएँ मर 

हर क्षण हमें पूरा ही चाहता है 

पूर्ण होकर ही पूर्ण से मिला जा सकता है 

हरेक फूल द्वारा 

अपनी तरह से ही खिला जा सकता है 

इसलिए यह पल दर्द का है या ख़ुशी का 

अनमोल है 

वक्त के लम्बे दौर में 

न इसका कोई मोल है ! 


13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-01-2022) को चर्चा मंच     "कोहरे की अब दादागीरी"  (चर्चा अंक-4314)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'     

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  2. पूर्ण होकर ही पूर्ण से मिला जा सकता है
    हरेक फूल द्वारा
    अपनी तरह से ही खिला जा सकता है
    सृजन के माध्यम से आपने बहुत सुन्दर बात कही है । बेहतरीन सृजन ।

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  3. चक्र घूम चुका हो चाहे कितनी बार

    पर हर बार बरसात

    किसी और ढंग से आयी है

    स्मृतियों का बोझ न रहे सिर पर

    न भावी का कोई डर

    इस पल में ही जी लें और मरना पड़े तो जाएँ मर

    हर क्षण हमें पूरा ही चाहता है

    पूर्ण होकर ही पूर्ण से मिला जा सकता है...बहुत गूढ़ और सुंदर,सार्थक रचना ।

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  4. आपको पढ़ते हुए हृदय बस आत्मसात कर तृप्त होता है । सच में कुछ नहीं बचता है कहने के लिए ।

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