सोमवार, अप्रैल 4

जो शून्य बना छाया जग में



जो शून्य बना छाया जग में 


जग जैसा है बस वैसा है 

निज मन को क्यों हम मलिन करें, 

जो पल-पल रूप बदलता हो 

उसे माया समझ नमन करें !

 

मन सौंप दिया जब प्रियतम को 

उन चरणों में ही झुका रहे,

फ़ुरसत है किसके पास यहाँ 

निज महिमा का ही हाथ गहें !

 

जो शून्य बना छाया जग में 

कण-कण में जिसकी आभा है, 

वह राम बना है कृष्ण वही 

उसका दामन ही थामा है !

 

जो जाग गया मन के भीतर 

वह  सिक्त सदा सुख सरिता में,

जग अपनी राह चला जाता 

वह ठहर गया इस ही पल में !


12 टिप्‍पणियां:

  1. जो जाग गया मन के भीतर

    वह सिक्त सदा सुख सरिता में,

    जग अपनी राह चला जाता

    वह ठहर गया इस ही पल में !
    बहुत सुंदर दर्शन!!!!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2022) को चर्चा मंच       "अट्टहास करता बाजार"    (चर्चा अंक-4392)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    --

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  3. बहुत सुन्दर !
    जो जाग गया मन के भीतर

    वह सिक्त सदा सुख सरिता में --

    बहुत गहरी बात !

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  4. जग जैसा है बस वैसा है
    निज मन को क्यों हम मलिन करें,
    जो पल-पल रूप बदलता हो
    उसे माया समझ नमन करें !
    अप्रतिम जीवन दर्शन । गहन सृजन ।

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  5. बहुत सुंदर सृजन। भवपूर्ण।

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