सोमवार, अप्रैल 18

चाँद बनकर

 चाँद बनकर 

मैंने चाँद बनकर धरा को देखा 

लहू से सराबोर 

लोगों को झूमते गाते देखा 

संग बहते हुए हवाओं के 

इक बूँद श्वास के लिए तरसते देखा 

अनंत रिक्तता में छा गया था वजूद मेरा 

चंद चीजों के लिए बिलखते देखा 

वह जो उड़ सकता था पल में  

जमीं से फलक तक 

धीमे-धीमे से उसे सरकते देखा 

मैं ही मालिक था चाँद तारों का 

चंद सिक्कों के लिए झगड़ते देखा 

जला सूरज सा कोई दिन-रात सदा 

भय से अंधेरों में किसी को सिसकते देखा !


15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 19 अप्रैल 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आज की परिस्थितियों से त्रस्त मन ऐसा ही सोचेगा ।
    गहन सृजन

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  3. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (20-04-2022) को चर्चा मंच      "धर्म व्यापारी का तराजू बन गया है, उड़ने लगा है मेरा भी मन"   (चर्चा अंक-4406)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    --

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  4. इसीलिए चाँद पर दाग़ है क्या ?

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  5. थोड़ा ऊपर उठकर सब दिखता है...विचारों से ऊपर उठेंतो ....बस दया भावना ही बचेगी ।
    बहुत सुन्दर सार्थक सृजन ।

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  6. निशब्द हूँ आपके सृजन पर प्रत्येक पंक्ति सराहनीय 👌

    मैंने चाँद बनकर धरा को देखा
    लहू से सराबोर
    लोगों को झूमते गाते देखा... कटु सत्य।
    सादर

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  7. नूपुर जी, सुधा जी व अनीता जी आप सभी का हृदय से आभार व स्वागत !

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