किताबें
किताबें बहलाती हैं,
भरमाती हैं
और कभी-कभी गिरते हुए को
सम्भालती भी हैं।
किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है
कभी-कभी सच को छिपाकर
खेल खिलाती हैं।
किताबें तो इक इशारा हैं
चंद्रमा की तरफ़
वह चाँद नहीं हैं,
सत्य के साधक को
किताबों के भी पार जाना है,
अपने भीतर के उस आलोक की खोज में,
जहाँ वे ले जाना चाहती हैं !!
किताबें सच्चा दोस्त, सही साथी होती हैं ...
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंsach hai!
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 17 मई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
बहुत बहुत आभार रवींद्र जी!
हटाएंसच्चा दोस्त सत्य साधक के लिए मार्गदर्शक होता है
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
सही कहा है आपने, स्वागत व आभार!
हटाएंकिताबें सांस्कृतिक धरोहर का अनुपम खजाना हैँ।
जवाब देंहटाएंजी हाँ, आप सही कह रहे हैं, स्वागत व आभार!
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