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मंगलवार, दिसंबर 8

कविता

कविता

कविता किसी झरने की भांति
सिमटी रहती है गहन कन्दराओं में
और फिर एकाएक फूट पड़ती है झरझर
या फिर बादलों में बूंद बन कर
फिर बरस पड़ती है शीतल फुहार बनकर
बीज बन रहती है मन की माटी में
छुपी रहती है पादप में रुत आने तक
फूल सी एक दिन खिल उठती है
कब आएगी उसकी खबर केवल
अस्तित्त्व को होती है...

शुक्रवार, जून 7

एक रास्ता है मन

एक रास्ता है मन

मन मानो भूमि का एक टुकड़ा है
उगाने हैं जहाँ उपवन फूलों भरे
जहाँ बिन उगाये उग आते हैं
खर-पतवार
हो सकता है अनजाने में गिराए हों बीज उनके भी
समय की अंतहीन धारा में  
जिस पर पनपे-उजड़े अनंत बार
कितने पादप कितने वृक्ष
पर अब जब कि पता चल गया है
पता उस खुशबू का
जिसकी जड़ छिपी है मन की ही माटी में कहीं गहरे
तो उपवन सजाना है
उसी को खिलाना है

मन मानो एक मदारी है
जब तक हम उसकी हरकतों पर बजाते हैं तालियाँ
तब तक दिखाता रहता है वह खेल
जिसे मिटाना ही है
उसे बड़ा क्यों करना
जिससे मुक्त होना ही है
उससे मोह क्यों लगाना
जिससे गुजरना भर है
क्यों बनाना उस पथ पर घर
एक रास्ता है मन
जो पार करना है
जब खो जाते हैं सारे अनुभव
तब कोई देखने वाला भी नहीं बचता
नाटक बंद होते ही
घर लौटना होगा
घर आना ही होगा हरेक को
एक यात्रा है मन
जो घर तक ले जाएगी....

शनिवार, मई 25

मन राधा बस उसे पुकारे


मन राधा बस उसे पुकारे


झलक रही नन्हें पादप में
एक चेतना एक ललक,
कहता किस अनाम प्रीतम हित
खिल जाऊँ उडाऊं महक !

पंख तौलते पवन में पाखी
यूँ ही तो नहीं हैं गाते,
जाने किस छुपे साथी को
टी वी टुट् में वे पाते !

चमक रहा चिकना सा पत्थर
मंदिर में गया जो पूजा,
जाने कौन खींच कर लाया
भाव जगे न कोई दूजा !

चला जा रहा एक बटोही
थम कर किसकी ओर निहारे,
गोविन्द राह तके है भीतर
मन राधा बस उसे पुकारे !